छापेखाने (प्रेस) के अविष्कारक --- -विलियम कैकसटन

आज से सात -- आठ सौ वर्ष पहले बहुत कम लोग पढ़े - लिखे होते थे | लोग पढ़ते कैसे ? पुस्तके ही नही थी | थोड़ी -- बहुत पुस्तके जो थी वे बहुत महँगी थी , कयोकि वे हाथ से लिखी जाती थी | एक पुस्तक लिखने में महीनों लगते | फिर यह पुस्तक कोई धनी आदमी खरीद लेता |

प्राचीन काल में कागज और कलम भी नही होते थे | लोग  राजहंस या बत्तख के पखो से कलम बनाते और भेड़ की खाल को साफ कर के उससे  कागज का काम लेते ,  , फिर अपने मनपसन्द रंग से उस पर लिखते | यदि  छापाखाना  ( प्रेस ) का आविष्कार न हुआ होता , तो आज प्रत्येक पुस्तक  दूसरी पुस्तक से भिन्न होती | फिर पुस्तके  इतनी बड़ी संख्या में बाजार में कहा से मिलती ? हम पर यह बड़ा उपकार किसने किया विलियम कैक्सटन ने |

विलियम कैक्सटन इंग्लैण्ड में पैदा हुए थे | उन दिनों में शिक्षा बहुत कम थी | फिर भी विलियम के पिता ने उन्हें घर पर थोड़ा -- बहुत पढ़ा लिखा दिया | विलियम कुछ सयाने हुए तो उनके पिता ने उन्हें लन्दन के एक व्यापारी के पास नौकर रखवा दिया | विलियम के पिता चाहते थे कि उनका बेटा व्यापार करना सीखे | जिस व्यापारी  के पास विलियम काम सिखने गया उनकी कम्पनी में लन्दन के कई अन्य व्यापारी भी शामिल थे | ये व्यापारी रेशम और ऊनि कपड़े खरीदते -- बेचते थे | विलियम थोड़े ही समय में कपड़े के व्यवसाय के गुर जान गये | उन्हें कपड़े की पूरी -- पूरी पहचान हो गयी | कपड़े के रंगों को देखते ही विलियम बता देते थे कि ये रंग कच्चे है या पक्के | कपड़ा अच्छा है या खराब |
उन दिनों लन्दन में व्यापारियों के सभाए भी होती थी | व्यापारी लोग अपने सामान का प्रचार करने के लिए इकठ्ठे होकर बाजारों में घूमते थे | विलियम की कम्पनी भी शहर में जलूस निकालती | उस समय विलियम अपने स्वामियों के पीछे -- पीछे जलूस में शामिल होते | सब व्यापारी गीत  और कविता पढ़ते हुए बाजार से गुजरते | विलियम बीस वर्ष के थे कि कम्पनी का स्वामी मर गया | विलियम को उनकी मौत का बड़ा दुःख हुआ | अब विलियम को घर से दूर वेल्जियम के नगर बुरोजज में भेज दिया गया | वहा  वह एक बड़े मकान में रहने लगे | विलियम  को शायद यह मकान पसंद न आता, लेकिन उस मकान में सभी अंग्रेज रहते थे | विलियम को विदेश में अपने देश के लोग मिल गये तो वह स्वदेश से दूर होने का दुःख भूल गये | वह बहुत जल्दी सब लोगो से घुल - मिल गये | विलियम बहुत ही समझदार थे | प्रत्येक का हमदर्द भी था | इसीलिए उस मकान में रहने वाले अंग्रेज ने उन्हें मकान का मैनेजर बना दिया | अब मकान की देखभाल , लोगो के खाने - पीने और मनोरंजन आदि सब का प्रबंध विलियम के हाथ में था | अंग्रेजो के आपस में झगड़े होते तो विलियम ही उनमे सुलह - सफाई करवाते | उन्हें जब फुर्सत मिलती , तो पुस्तके ढूढने निकलते और घर लाकर रात - रात  भर पढ़ते रहते | विलियम जब वहा  से जर्मनी  गये तो वह वहा  के कई धनी आदमियों से मिले | इन मुलाकातों में विलियम ने इन धनी लोगो के पास पुस्तके देखी  | ये पुस्तके चमड़े पर हाथ से लिखी हुई थी  | लिखने वालो ने बड़े सुन्दर रंग का उपयोग किया था | इन पुस्तको में हाथ से बनी हुई तस्वीरे भी थी | विलियम को फ्रांससी भाषा में लिखी हुई एक पुस्तक मिल गयी | उन्हें यह पुस्तक इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने पुस्तक का अंग्रेजी  में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया और अपनी पुस्तक का नाम '' ट्राय का इतिहास '' रख दिया | पुस्तक बहुत बड़ी थी | विलियम ने उसे नकल और अनुवाद करने में दिन - रात एक कर दिए | वह काफी समय तक अनुवाद में लगे रहे | आखिर उनकी नजर कमजोर हो गयी | उनकी आँखों से हर समय पानी बहने लगा | हाथ से बिलकुल  शिथिल हो गये | उन्होंने विवश होकर अनुवाद बंद कर दिया लेकिन उसी दिन से सोचने लगे कि कोई ऐसा तरीका होना चाहिए जिससे पुस्तक आसानी से नकल हो जाए और साथ ही बहुत सी पुस्तके एक साथ तैयार हो जाए | जर्मनी और हालैंड में घूमते हुए विलियम को पता चला कि कई लोग लकड़ी को खोदकर उसमे कुछ अक्षर उभार  लेते है | उभरे हुए अक्षरों पर रंग लगा देते है और फिर कागज चिपका कर उसका प्रतिबिम्ब उतार लेते है | इस प्रकार आक्ग्ज पर उभरे हुए अक्षर नकल हो जाते है | विलियम बुरोजज वापस आये , तो किसी ऐसे आदमी को ढूढने लगे , जो लकड़ी पर अक्षर बनाना जानता हो | उन्हें एक दुकानदार मिल गया | विलियम ने बूढ़े आदमी को समझाया कि भई लकड़ी के अक्षर बनाना ठीक नही है , कयोकि लकड़ी फट जाती है और अक्षर बेकार हो जाते है | विलियम ने उसे सलाह दी कि लकड़ी के बजाए धातु के छोटे - छोटे अक्षर बनाये | फिर एक चौखटा तैयार किया | विलियम उस चौखटे में सभी अक्षर इकठ्ठे करके कस  देते | अक्षर पर स्याही लगाते और कागज चिपका -- चिपकाकर उतर लेते | इस प्रकार शब्द कागज पर बिल्कुल  साफ छप जाते | विलियम ने यह आविष्कार पूरा कर लिया तो अपना छापाखाना ( प्रेस ) लेकर अपने देश वापस आ गये | लन्दन आते ही विलियम ने एक दुकान में छापाखाना लगा दिया दुकान के बाहर छापेखाने का बोर्ड  लगाया | सारे  संसार में यह सबसे पहला छापाखाना था | लोग हैरान थे | लन्दन में रहने वाले भाग  -- भाग कर छपाई का तमाशा देखने के लिए विलियम की दुकान पर आते | विलियम के छापेखाने की हर और धूम मच गयी | यहाँ तक कि इंग्लैण्ड  का सम्राट एडवर्ड चतुर्थ भी यह विचित्र मशीन  को देखने आया | शाही जलूस जब छापेखाने पहुचा तो विलियम और उसके साथी अपने काम  में लगे हुए थे | दुकान में हर और धातु के छोटे - छोटे अक्षरों के ढेर पड़े थे | सम्राट और उसके धनी मंत्रियों ने कागज छपते देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ | विलियम ने अपने छापेखाने में बहुत सी सस्ती पुस्तके छापी | प्राचीन काल में तो पुस्तके महँगी थी और केवल धनी आदमी ही उन्हें खरीद सकते थे | अब पुस्तके सामान्य लोगो के हाथो में भी पहुच गयी | लोग बड़े शौक से पुस्तके पढने और सुनने लगे | विलियम ने कहानियो की बहुत सी पुस्तके वीरो के कारनामे , गिरजे की प्रार्थनाये , प्रवचन छापे | विलियम कहते थे कि विद्या बड़े आदमियों के घर की दासी नही है कि हर समय उन्ही की सेवा करती रहे | विद्या प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है | विद्या पुस्तको से प्राप्त होती है | इसीलिए पुस्तके अधिक से अधिक और सस्ती छपनी चाहिए |
विलियन अब इस दुनिया में नही है लेकिन उनका कारनामा अब भी जिन्दा है | विलियम के बाद छापेखाने की बड़ी उन्नति हुई | संसार में प्रत्येक नगर में कई - कई छापेखाने खुले | हजारो - लाखो पुस्तके , पत्रिकाए और अख़बार छपने लगे | अज छापेखाने में ऐसी मशीने लगी हुई है जो रातो -- रात हजारो अखबार छापकर तैयार कर देती है | आधुनिक तकनीक के प्रेस समेत पुस्तकीय ज्ञान से आलोकित समस्त विश्व विलियम कैक्सटन का ऋणी है और रहेगा |  
sunil kumar dutta's profile photo

-सुनील दत्ता
  स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
आभार सुरजीत की पुस्तक '' प्रसिद्द वैज्ञानिक और उनके आविष्कार '' से

जिनके हम ऋणी हैं...अलेक्जेंडर ग्राहम बेल

आज की दुनिया बड़ी तेजी से चल रही है और बदल भी रही है --- आज हम जिस ग्लोबल दुनिया में जी रहे है उसमे एक ऐसे यंत्र का योगदान है जिसके बिना अब हम जी भी नही सकते है वो है टेलीफोन -- आज हम ले चलते है टेलीफोन के उस अविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल के पास अगर उन्होंने इस यंत्र को ईजाद न किया होता तो शायद हम इस ग्लोबल दुनिया में नही जीते -----

तीसरे पहर का समय था बोर्डिंग -- हाउस के एक पुराने कमरे में बिजली के तार बिखरे हुए थे | तारो के जाल में उलझा हुआ एक आदमी उपर के मंजिल में और दूसरे निचली मंजिल के एक कमरे में बैठा था | उपर कमरे में बैठा हुआ आदमी एक भद्दा सा यंत्र मुख से लगाये बार - बार एक वाक्य बोल रहा था और नीचे बैठा हुआ आदमी उस वाक्य को सुनने का प्रयतन कर रहा था | अकस्मात नीचे बैठा हुआ आदमी अपना यंत्र फेंककर उठा और तेजी से उपरी मंजिल की और भभागा | उपर पहुचते ही वह ख़ुशी से चिल्लाया -- मैंने बात सुन ली | ईश्वर की सौगंध साफ़ सुनाई देती है | आपने कहा था --- '' यहाँ आइये मुझे आपकी जरूरत है '' | तारो में उलझा हुआ आदमी हँसने लगा -- '' ईश्वर का धन्यवाद है मुझे अपनी कई वर्ष की मेहनत का फल मिल गया '' |

यह महान वैज्ञानिक कोई और नही अलेक्जेंडर ग्ग्राहम बेल थे | उन्होंने अपने साथी वाटसन से ( जो निचले कमरे में थे ) बाते की थी और जिस यंत्र पर ग्राहम बेल ने बात की थी , उसे आज हम टेलीफोन कहते है |

ग्राहम बेल स्काटलैंड के एक नगर एडनबरा में जन्मे थे | उनके पिता प्रसिद्द आदमी थे | बेल के पिता ने गुंगो और बहरो को पढाने के लिए नये ढंग का आविष्कार किया था | ग्राहम बेल शुरू में अपने नगर में पढ़ते रहे | फिर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लन्दन भेजा गया | बाद में उन्होंने जर्मनी से पी . एच . डी की डिग्री प्राप्त की | शिक्षा के बाद घर वापस आये तो उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चूका था | डाक्टरों ने कहा कि बेल को क्षयरोग होने की आशका है | उनके पिता को बहुत चिंता हुई | वह तत्काल बेटे को अपने साथ लेकर कनाडा चले गये | कनाडा में बेल का स्वास्थ्य सुधर गया |
ग्राहम बेल को बचपन से ही नई चीजे मालूम करने का शौक था | जब वह स्कूल में पढ़ते थे . तो एक दिन मित्रो के साथ एक पहाड़ी पर गये | वहा आटा पिसने का एक कारखाना था और बहुत सी गेहू की बालिया पड़ी थी | कारखाने के स्वामी ने सब लडको को एक -- एक बाली दी | बाकी लडको ने तो बालिया फेंक दी . लेकिन बेल बाली घर ले आये | उन्हें एक नई बात सूझी | झट जेब से नाख़ून तराश निकला और उससे गेंहू के दानो को अलग -- अलग करने लगे | उन्होंने देखा कि इस ढंग से दाने बहुत जल्दी और सफाई से निकल आते है | बेल ने अपना यह प्रयोग कारखाने के स्वामी को लिख भेजा | स्वामी ने उनको धन्यवाद किया और बालियों से गेंहू निकालने के लिए नाख़ून तराश से मिलती -- जुलती कई मशीन बनवा ली |
जब बेल का स्वास्थ्य ठीक हो गया तो उन्होंने अमरीका के पुराने नगर बोस्टन में एक स्कुल खोल लिया | इस स्कुल में बेल उन अध्यापको को प्रशिक्ष्ण देते जो बहरो को पढाते थे | बेल को विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर बना दिया गया | उन्ही दिनों बेल की मुलाक़ात एक भरी लडकी से हुई | यह लड़की बेल के काम में बहुत मदद करती थी | बाद में दोनों ने विवाह कर लिया | बहरो को पढ़ाते -- पढ़ाते बेल ने सोचा कि किसी ऐसे यंत्र का आविष्कार करना चाहिए जिससे कई मील दूर बैठे हुए आदमी से बात की जा सके | उन्होंने सोचा कि बिजली की शक्ति के जरिये मनुष्य की आवाज एक जगह से दूसरी जगह पहुच सकती है |
मनुष्य के कान की बनावट का पता चला , तो बेल ने बोस्टन के एक बोर्डिंग -- हॉउस में दो कमरे किराए पर लिए और प्रयोगों में व्यस्त हो गये | कई दिन की लगातार मेहनत के बाद आखिर उन्होंने एक भद्दा यंत्र तैयार कर लिया | इस यंत्र से बेल ने अपने सहायक से यह बात कही , मिस्टर वाटसन , यहाँ आइये , मुझे आपकी जरूरत है |

ग्राहम बेल अपने आविष्कार पर बहुत परसन्न हुए | उन दिनों नगर में एक प्रदर्शनी लगी हुई थी | बेल ने लोगो को दिखाने के लिए अपना यंत्र प्रदर्शनी में रख दिया < लेकिन किसी ने उस यंत्र में रूचि नही ली | इस बात से बेल को बड़ा दुःख हुआ | सयोगवश ब्राजील के सम्राट को , जो प्रदर्शनी देख रहे थे , इस आविष्कार का पता चला | उन्होंने टेलीफोन का चोगा कान पर रखकर ग्राहम बेल से कहा -- '' आप मुझसे कोई बात करे "

बेल ने अपने यंत्र से शेक्सपियर के प्रसिद्द नाटक से एक वाक्य बोला | दूसरी और खड़े ब्राजील के सम्राट उछल पड़े '' बिलकुल साफ़ आवाज आती है '' सम्राट इस आविष्कार से खुश हुए , तो सब लोग रूचि लेने लगे और बेल प्रख्यात हो गये |
इधर बेल का आविष्कार सफल हुआ , उधर कई अन्य लोग भी टेलीफोन के अविष्कारक बन बैठे | बेल के लिए बड़ी कठिनाई पैदा हो गयी | कई दावेदारों ने बेल पर मुकदमे कर दिए | बेल एक अवधि तक अदालतों में फंसे रहे | आखिर वह मुकदमा जीत गये और सबने मान लिया कि असल आविष्कार ग्राहम बेल का है | अब बेल लोगो के लिए टेलीफोन तैयार करना चाहते थे लेकिन उनके पास रुपया नही था | उन्होंने कई लोगो से मदद मांगी | जब रुपयों का प्रबंध हो गया , तो टेलीफोन तैयार होने लगा | इससे बेल के पास धन का पर्याप्त संचय होने लगा |
ग्राहम बेल ने अपने नाम से एक कम्पनी तैयार की | उसमे तीन भागीदार थे | कम्पनी ने व्यसाय शुरू कर दिया , लेकिन बेल को व्यवसाय से कोई दिलचस्पी नही थी | उन्होंने सोचा कि अब दूसरी चीज का आविष्कार होना चाहिए | बेल ने फोटोफोंन और ग्रामाफोन का आविष्कार किया | उन्होंने एक ऐसी पतंग तैयार की , जिसमे बैठकर एक आदमी उड़ सकता था | यह पतंग कुछ ऊँची उड़कर नीचे गिर पड़ी | अब बेल भेड़ो पर प्रयोग करने लगे | उनका विचार था कि वह ऐसी भेड़ पैदा करने में सफल हो जाए , जो सदा जुडवा बच्चे दिया करेगी | बेल का यह प्रयोग सफल नही हुआ | बेल ने एक कुत्ते को मानवीय बोली सिखानी शुरू की थी | यह कुत्ता थोड़ा बहुत बोलने भी लगा | लोगो को पता चला , तो दूर -- दूर से उस कुत्ते को देखने के लिए आए |

ग्राहम बेल बहुत समय के बाद अपने नगर एडनबरा लौटे | अब वह प्रख्यात आदमी थे | बेल के नगर के लोगो ने उनका बड़ा सम्मान किया | आखिर 1922 में अगस्त की दो तारीख को ग्राहम बेल का देहान्त हो गया |

आज हम टेलीफोन के द्वारा घर बैठे दूर से दूर बैठे अपने परिचितों से बाते कर लेते है जब भी टेलीफोन की गनती बजती है ग्राहम बेल के याद ताजा हो जाती है | वर्तमान दौर की सुचना -- क्रान्ति और उसका लाभ उठा रहा मानव समाज इस सुचना -- क्रान्ति के प्रारम्भिक पर महान अविष्कारक ग्राहम बेल के ऋणी है और ता उम्र ऋणी रहेगे |

-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
आभार सुरजीत की पुस्तक '' प्रसिद्द वैज्ञानिक और उनके आविष्कार '' से

रहस्यदर्शी -- व्यक्तित्व ------अलबर्ट आइन्सटीन

रहस्यदर्शी -- व्यक्तित्व अलबर्ट आइन्सटीन -------------- ( 14 मार्च , 1879 -- अप्रैल 18 , 1955 ) मन स्मृति है , बुद्दिमत्ता नही | बुद्दिमत्ता तब होती है जब तुम नई बातो का , नई मुश्किलों का सामना करते हो और तुम्हारा अस्तित्व उन नई समस्याओं को प्रतिबिबिम्बित करता और उसके समाधान खोजता है | तुम्हे उनके बारे में कभी नही बताया गया , तुमने कभी उनका अध्ययन नही किया | तुम्हारी स्मृति कोई उत्तर देने में पूरी तरह से अक्षम होती है | बड़े -- बड़े बुद्दिजीवी लोग नई समस्याओं का सामना करने में सदा कठिनाई में पड़ जाते है | ऐसा कहा जाता है कि एक दिन अलबर्ट आइन्सटीन , संसार के महानतम गणितज्ञो में से एक , विश्विद्यालय जाने के लिए बस में सधा और कंडक्टर को पैसे दिए | कंडेक्टर ने उसे टिकट और बचे हुए कुछ पैसे वापस किये | उसने पैसे गिने और कहा : ' क्यों भाई , तुम मुझे धोखा दे रहे हो ? " कंडक्टर ने कहा : ' शायद , कोई भूल हो गयी ... मुझे दुबारा गिनने दीजिये | ' उसने पैसे गिने और अलबर्ट आइन्सटीन ने कहा : महानुभाव , ऐसा लगता है आपको गिनती - विनती नही आती , आप जानते ही नही कि गुना -- भाग कैसे किया जाता है | कृपया चुप रहे और बैठ जाए | ' आइन्सटीन ने घर आकर अपनी पत्नी से कहा : ' मैं एकदम घबडा गया ; सारी बस हंस रही थी | वह तो अच्छा हुआ कि बस में कोई और प्रोफ़ेसर या विद्यार्थी न था ; किसी को पता न था कि मैं अलबर्ट आइन्सटीन हूँ | और कंडक्टर कह रहा था , ' आपको गिनती नही आती | ' और मैं मानवता के इतिहास में सर्वाधिक बड़ी संख्याओं के साथ कम किया है , मेरा सारा काम ही संख्याओं का है | मगर मैंने सोचा कि इस बारे में शोर न मचाना ही बेहतर है | तुम जरा ये पैसे गिनो और बताओ कि वह मुझे धोखा दे रहा था या कि मैं ही गलत था ? पत्नी ने पैसे गिने और बोली : ' ये बिलकुल ठीक है | तुम्हारी टिकट , जो पैसे तुमने उसे दिए , और जो उसने लौटाए उन्हें देख कर तो यही लगता है कि पूरा हिसाब एकदम सही है | और लगता यही है कि तुम गणित नही जानते ! तुम बड़ी संख्याओं के इतने आदि हो गये हो ... संख्याय जिसने आगे सैकड़ो शून्य लगे रहते है .. छोटी -- मोती संख्याओं को तो तुम भूल ही गये हो | तुम आगे कभी किसी से कुछ न कहना ; यदि कभी ऐसी स्थिति आ भी जाए , तो चुप ही रहना | ' मेरे एक मित्र , डाक्टर राम मनोहर लोहिया से मिलने गये थे -- डाक्टर लोहिया की शिक्षा जर्मनी में हुई थी | और वे नियत समय पर मिलने के लिए पहुचे गये | अलबर्ट आइन्सटीन की पत्नी ने खा ; ' आपको कुछ देर प्रतीक्षा करनी होगी | मैं सुनिश्चित रूप से नही बता सकती कि आपको कितनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी , क्योकि वे स्नान गृह में है और जब वे स्नान गृह में होते है तब उन्हें कोई बाधा पहुचाये , यह उन्हें बिलकुल पसंद नही है | और किसी को पता नही कि वे कितनी देर बाथरूम में रहेगे | ' डाक्टर लोहिया ने कहा : ' ठीक है , मैं प्रतीक्षा कर्ता हूँ | ' उन्होंने सोचा कि पन्द्रह मिनट , आधा घंटा -- कोई स्नान - गृह में इससे अधिक और क्या ठहरेगा ? मगर छह घन्टे बीत गये .. पत्नी ने उन्हें नाश्ता कराया , दोपहर का भोजन कराया और लोहिया ने कहा : ' हे भगवान , वे अभी भी तब में बैठे हुए है ? आखिर वे कर क्या रहे है ? पत्नी ने कहा : ' शुरू -- शुरू में जब हमारी शादी हुई थी मैं उन्हें बाधा पहुचा देती थी तो वे सारा दिन गुस्से में रहते थे | वे चीजे फेकते , सब तरह के उपद्रव करते , चीखते , चिल्लाते | वे बहुत परेशान हो जाते थे , क्योकि गणित की साड़ी खोज उन्होंने अपने तब में बैठकर साबुन के बुलबुलों के साथ ही की है | वे बुलबुलों से साबुन के बुलबुलों से खेलते रहते है ..... उनके लिए ये बुल;बुले ही तारे है | और वे गणित बिठाते रहते है . मैं नही जांति कि कैसे , परन्तु वे हिसाब -- किताब लगाते रहते है -- उन्होंने स्नान गृह की सब दिवालो पर लिखा हुआ है | मैं आपको उनका स्नान गृह दिखाउगी , वह सब गणित ही गणित है | ' छ घन्टे बाद अलबर्ट आइन्सटीन बाहर निकला और बोला : ' अच्छा तो आप आ गये ? आप बिलकुल ठीक समय पर आये है | जैसे ही मैं स्नान -- गृह से बाहर निकला आप यहाँ बैठे हुए है | ' डाक्टर लोहिया ने कहा : मैं यहाँ छ घन्टे से बैठा हुआ हूँ | ' वह बोला : हे भगवान ! छ घन्टे हो गये .. मुझे क्षमा कर दो क्योकि जब मैं अपने तब में साबुन के बुलबुलों के साथ होता हूँ , मैं समय को भूल ही जाता हूँ | तब बस गढ़ -- नक्षत्रो और सितारों के बारे में नये समीकरण , उनकी दुरिया -- तुम मेरा स्नान गृह देखो | ' डाक्टर लोहिया ने मुझे बताया कि ' वे दोनों स्नान गृह में ले गये | सब दीवालो पर बड़ी -- बड़ी समीकरण लिखी हुई थी ' उनकी समझ से बाहर था वे तो गणितज्ञ नही थे | डाक्टर लोहिया ने कहा " ' आपने तो अपने स्नान गृह को प्रयोगशाला बना रखा है | ' आइन्सटीन ने कहा : ' मैंने नही बनाई यह अपने आप ही प्रयोगशाला बन गयी है | ये साबुन के बुलबुले किसी न किसी रूप में सितारों से मिलते -- जुलते है " अब यह आदमी श्रेष्ठ्तम गणितज्ञ और बुद्दी के चरम शिखर पर पहुचे हुए व्यक्तियों में से एक था | परन्तु वह एक अत्यन्य कुरूप और अमानवीय घटना का कारण बना जो कि गैर -- बुद्दिमत्तापूर्ण थी | वही हिरोशिमा और नागासाकी में हुते भीषण नरसंहार का कारण था , क्योकि उसने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा : मैं परमाणु बम बना सकता हूँ | और आपने पास परमाणु बम का होना ही पर्याप्त होगा , उन्हें छोड़ने की कोई आवश्यकता नही पड़ेगी | क्योकि जर्मनी और जापान से आत्मसमर्पण कराने के लिए परमाणु बम का पास होना ही काफी है | ' मगर यह एक बहुत ही नासमझी भरा , नादानी पूर्ण कार्य था जो उसने किया | रूजवेल्ट ने उसे अनुमति दे दी , साथ ही परमाणु बम बनानेके लिए साड़ी सुविधाए भी प्रदान की | उसने परमाणु बम बनाये और एक बार जब परमाणु बम बन गये , वे राजनितिज्ञो के हाथ में पहुच गये | आइन्स्टीन ने उन्हें लिखा -- रूजवेल्ट अब राष्ट्रपति न था , ट्रूमैन राष्ट्रपति बन गया था , उसने ट्रूमैन को लिखा कि --- ' उन बमो का प्रयोग नही किया जाना चाहिए | पत्र में यही मेरी पहली शर्त थी | ' लेकिन ट्रूमैन ने पत्र का उत्तर तक नही दिया | कौन प्रवाह करता है ? तुमने अपना कम कर दिया , तुम्हे अपने काम की कीमत मिल गयी | अब तुम बमो के स्वामी नही हो , बम तो सरकार के है | और ट्रूमैन ने उन बमो को हिरोशिमा और नागासाकी पर बिना किसी कारण के गिराया | जर्मनी तो पहले ही पराजित हो चूका था , उसने अपनी पराजय स्वीकार भी कर ली थी | और जापान किसी भी दिन आत्समर्पण के लिए तैयार था .. विशेषज्ञ कहते है कि अधिक से अधिक एक या दो सप्ताह के भीतर जापान समर्पण करने ही वाला था | जर्मनी के बिना जापान युद्द में अकेला टिक नही सकता था और उन लोगो को जिनका युद्द से कुछ लेना देना न था छोटे बच्चे स्त्रिया वृद्द मान बाप गर्भवती औरते जिन्हें युद्द से कोई मतलब न था उन्हें नष्ट कर देने की कोई आवश्यकता न थी | और यह कोई छोटी संख्या नही थी -- हर नगर में एक लाख से अधिक व्यक्ति रहते थे | दो लाख व्य्कतियो को .... लेकिन ट्रूमैन इन बमो का जितनी जल्दी से जल्दी संभव हो सके उपयोग करने में उत्सुक था क्योकि जापान ने समर्पण कर दिया , तो फिर कोई अवसर नही छोड़े जा सकते थे | फिर कोई अवसर नही बचेगा , बहाना नही मिलेगा | और वह प्रयोग करना चाहता था | वह अणु -- बमो की शक्ति -- परिक्षण का एक प्रयोग था | दो लाख व्यक्ति क्षण भर में जलकर ख़ाक हो गये | और कई -- कई पीढियों तक उन दो बमो का असर जारी रहेगा , न केवल मनुष्यों में ; मछलियों में पशुओ में वृक्षी में सब जगह रेडियेशन व्याप्त रहेगा | उस समय अलबर्ट आइन्सटीन रो रहा था और कह रहा था , ' मैं एक बुद्दिहींन आदमी हूँ | मैं एक सरल सी बात नही देख पाया ; कि एक बार तुम राजनितिज्ञो के हाथ में शक्ति सौप दो , फिर यह तुम्हारे हाथ से बाहर की बात हो जाती है , फिर तुम कुछ नही कर सकते | ' मृत्यु के समय उसके अंतिम शब्द थे ; ' अपने अगले जन्म में मैं एक नल ठीक करने वाले कारीगर की भाँती पैदा होना पसंद करूंगा न कि एक भौतिक -- विद की भांति , क्योकि मैं ऐसे हत्यारे कृत्य पुन: नही करना चाहूंगा | और यह मेरी मूढ़ता था ... हालाकि जो प्रस्ताव उसने रखा था वह बौद्दिक जरुर था , पर विवेकपूर्ण जरा भी न था : शक्ति का प्रदर्शन ही पर्याप्त है ' | लेकिन राजनितिज्ञ अपनी शक्ति दिखाने के लिए इतने आतुर , इतने भूखे है कि जब तक कि सारी दुनिया उसे महसूस न कर ले . वे स्वंय को रोक पाने में असमर्थ होते है | प्रस्तुती --- सुनील दत्ता साभार अनंत से अनंत की ओर ------ ओशो -------( स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक )

कूका विद्रोह और उसके नायक रामसिंह ................................भगत सिंह

{ शहीद भगत सिंह ने राष्ट्र के स्वतंत्रता आन्दोलन के नायको के जीवन और उनके क्रांतिकारी क्रिया कलाप , त्याग व बलदान पर श्रृखलाबद्ध लेख लिखा था | कूका विद्रोह और उसके महानायक राम सिंह पर उन्होंने दो लेख लिखे थे | पहला लेख फरवरी 1928 में उन्होंने बी . ए. सिधु के नाम से दिल्ली से प्रकाशित '' महारथी '' और दूसरा लेख अक्तूबर 1928 में विद्रोही के नाम से किरति '' नामक पत्रिका में लिखा था | एक और बात -- कूका विद्रोह के महानायक राम सिंह से देश के धर्मज्ञो और धर्म गुरुओं से लेकर नए पुराने धर्म के अनुयायियों को भी सीख लेनी चाहिए और वह भी वर्तमान राष्ट्रीय व सामाजिक संदर्भो में | आज विदेशी शक्तिया पुन: देश के हर क्षेत्र में अधिकाधिक व आधिकारिक रूप से घुसपैठ करती जा रही है | इसके फलस्वरूप देश के बहुसंख्यक जनसाधारण का जीवन निरंतर तबाही व बर्बादी की दिशा में बढ़ता जा रहा है | इस दिशा में उसे विदेशी साम्राज्यी शक्तियों के अलावा देश के हर धर्म सम्प्रदाय के धनाढ्य व उच्च हिस्सों द्वारा ढकेला जा रहा है | इसीलिए वर्तमान दौर में कूका विद्रोह और गुरु राम सिंह के बारे में भगत सिंह का लेख पढने के लिए ही नही पढ़ा जाना चाहिए , बल्कि उसे अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे देशो और उनकी पूंजी तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चंगुल से राष्ट्र व समाज की मुक्ति संघर्ष के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए ............................आज हम पंजाब के तख्ता पलटने के आन्दोलन और राजनितिक जागृति का इतिहास पाठको के सामने रख रहे है | पंजाब में सबसे पहली राजनितिक हलचल कूका आन्दोलन से शुरू होती है | वैसे तो वह आन्दोलन साम्प्रदायिक -- सा नजर आता है , लेकिन जरा गौर से देखे तो वह बढा भारी राजनैतिक आन्दोलन था , जिसमे धर्म भी मिला था जिस तरह कि सिक्ख आन्दोलन में पहले धरम और राजनीति मिली -- जुली थी | खैर हम देखते है कि हमारी आपस की साम्प्रदायिक और तंगदिली का यही परिणाम निकलता है कि हम अपने बड़े -- बड़े महापुरुषों को इस तरह भूल जाते है जैसे कि वे हुए ही न हो | यही स्थिति हम हम अपने बड़े भारी महापुरुष '' गुरु राम सिंह के सम्बन्ध में देखते है | हम '' गुरु नही कह सकते और वे गुरु कहते है , इसीलिए हमारा उनसे कोई सम्बन्ध नही -- आदि बाते कहकर हमने उन्हें दूर फेंक रखा है | यही पंजाब का सबसे बड़ा घाटा है | बंगाल के जितने भी बड़े -- बड़े आदमी हुए है , उनकी हर साल बरसिया मनाई जाती है , सभी अखबारों में उन पर लेख दिए जाते है , यह समझा जाता है कि मौक़ा मिला तो इस पर विचार करेंगे |पंजाब को सोए थोड़े ही दिन हुए थे , लेकिन नीद बड़ी गहरी आई | हालाकि अब फिर होश आने लगा है | बड़ा भारी आन्दोलन उठा | उसे दबाने की कोशिश की गयी | कुछ ईश्वर ने स्थिति भी ऐसी ही पैदा कर दी --- वह आन्दोलन भी कुचल दिया गया | उस आन्दोलन का नाम था'' कूका आन्दोलन'' | कुछ ध्रामिक , कुछ सामाजिक रंग -- रूप रखते हुए भी वह आन्दोलन एक तख्ता पलटने का नही , युग पलटने का था | चूकी अब इन सभी आंदोलनों का इतिहास यह बताता है कि आजादी के लिए लड़ने वाले लोगो का एक अलग ही वर्ग बन जाता है , जिनमे न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओ -- जैसा दुनिया का त्याग ही | जो सिपाही तो होते थे लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नही , बल्कि सिर्फ अपने फर्ज के लिए या किसी काम के लिए कहे , वे निष्काम भाव से लड़ते और मरते थे | सिक्ख इतिहास यही कुछ था | मराठो का आन्दोलन भी यही कुछ बताता है | राणा प्रताप के साथी राजपूत भी इसी तरह के योद्धा थे | बुन्देलखंड के वीर छत्रसाल के साथी भी ऐसे थे |ऐसे ही लोगो का वर्ग पैदा करने वाले बाबा रामसिंह ने प्रचार और संगठन शुरू किया | बाबा रामसिंह का जन्म 1824 में लुधियाना जिले के भैणी गाँव में हुआ | आपका जन्म बढ़ई घराने में हुआ था | जवानी में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में नौकरी की | ईश्वर -- भक्ति अधिक होने से नौकरी -- चाकरी छोड़कर गाँव जा रहे | नाम का प्रचार शुरू कर दिया |1857 के गदर में जो जुल्म हुए वे सब देखकर और पंजाब की गद्दारी देखकर कुछ असर जरुर हुआ होगा | किस्सा यह है कि बाबा रामसिंह जी ने उपदेश शुरू करवा दिया | साथ -- साथ बताते गये कि फिरंगियों से पंजाब की मुक्ति जरूरी है | उन्होंने तब उस असहयोग का प्रचार किया , जैसे वर्षो बाद 1920 में महात्मा गांधी ने किया | उनके कार्यक्रम में अंग्रेजी राज की शिक्षा , नौकरी अदालतों आदि का और विदेशी चीजो का बहिष्कार तो था ही , साथ में रेल और तार का भी बहिष्कार किया गया |पहले -- पहले सिर्फ नाम का ही उपदेश होता था | हां यह जरुर कहा जाता था कि शराब -- मांस का प्रयोग बिलकुल बंद कर दिया जाए | लडकिया आदि बेचने जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी प्रचार होता था , लेकिन बाद में उनका प्रचार राजनितिक रंग में रंगता गया |पंजाब सरकार के पुराने कागजो में एक स्वामी रामदास का जिक्र आता है , जिसे कि अंग्रेजी सरकार एक राजनितिक आदमी समझती थी और जिस पर निगाह रखी जाती थी | 1857 केबाद जल्द ही उसके रूस की ओर जाने का पता चला है | बाद में कोई खबर नही मिलती | उसी आदमी के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसने एक दिन बाबा रामसिंह से कहा कि अब पंजाब में राजनितिक कार्यक्रम और प्रचार की जरूरत है | इस समय देश को आजाद करवाना बहुत जरूरी है | तब से आपने स्पष्ट रूप से अपने उपदेश में इस असहयोग को शामिल कर लिया1863 में पंजाब सरकार के मुख्य सचिव रहे टी .डी. फार्सिथ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 1863 में ही मैं समझ गया था कि यह धार्मिक -- सा आन्दोलन किसी दिन बड़ा गदर मचा देगा | इसीलिए मैंने भैणी के उस गुरुद्वारे में ज्यादा आदमियों का आना -- जाना और इकठ्ठे होना बन्द कर दिया | इस पर बाबा जी ने भी अपना काम का ढंग बदल लिया | पंजाब प्रांत को 22 जिलो में बाट लिया | प्रत्येक जिले में एक -- एक व्यक्ति प्रमुख नियुक्त किया गया , जिसे '' सूबा '' कहा जाता था | अब उन्होंने '' सूबों '' में प्रचार और संगठन का काम शुरू किया | गुप्त तरीको से आजादी का भी प्रचार जारी रखा | संगठन बढ़ता गया , प्रत्येक नामधारी सिक्ख अपनी आय का दसवा हिस्सा अपने धर्म के लिए देने लगा | बाहर का हंगामा बंद हो जाने से सरकार का शक दूर हो गया और 1869 में सभी बंदिशे हटा ली गयी | बंदिशे हटते ही खूब जोश बढ़ा |एक दिन कुछ कूके अमृतसर में से जा रहे थे | पता चला कि कुछ कसाई हिन्दुओं को तंग करने के लिए उनकी आँखों के सामने गोहत्या करते है | गाय के तो वे बड़े भक्त थे | रातो -- रात सभी कसाइयो को मार डाला गया और रास्ता पकड़ा | बहुत से हिन्दू पकडे गये | गुरु जी ने पूरी कहानी सुनी | सबको लौटा दिया कि निर्दोष व्यक्तियों को छुडाये और अपना अपराध स्वीकार करे | यही हुआ और वे लोग फांसी चढ़ गये | ऐसी ही कोई घटना फिरोजपुर जिले में भी हो गयी थी | फांसियो से जोश बढ़ गया | उस समय उन लोगो के सामने आदर्श था पंजाब में सिख -- राज स्थापित करना और गोरक्षा को वे अपना सबसे बढ़ा धर्म मानते थे | \इसी आदर्श की पूर्ति के लिए वे प्रत्यन करते रहे |13 जनवरी 1872 को भैणी में माघी को मेला लगने वाला था | दूर -- दूर से लोग आ रहे थे | एक कूका मलेर कोटला से गुजर रहा था | एक मुसलमान से झगड़ा हो जाने से वे उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये और उसे बहुत मारा पिटा व एक बैल की हत्या उसके सामने की गयी | वह बेचारा दुखी हुआ भैणी पंहुचा | वह जाकर उसने अपनी व्यथा सुनाई | लोगो को बहुत जोश आ गया | बदला लेने का विचार जोर पकड गया | जिस विद्रोह का भीतर -- भीतर प्रचार किया गया था , उसे कर देने का विचार जोर पकड़ने लगा , लेकिन अभी मनचाही तैयारी भी नही हुई थी | बाबा रामसिंह ऐसी स्थिति में क्या करते ? यदि उन्हें मना करते है तो वे मानते नही और यदि उनका साथ देते है तो सारा किया -- धरा तबाह होता है | क्या करे ? आखिर जब 150 आदमी चल ही पड़े तो आपने पुलिस को खबर भेज दी कि यह व्यक्ति हंगामा कर रहे है और शायद कुछ खराबी करे मैं जिम्मेदार नही हूँ | ख्याल था कि हजारो आदमियों के संगठन में से सौ---- डेढ़ सौ आदमी मारे गये और बाकी संगठन बचा रहे तो यह कभी तो पूरी हो जायेगी और जल्द ही फिर पूरी तैयारी होने से विद्रोह हो सकेगा | लेकिन हम यह देखते है कि परिणाम से तय होता है कि तरीके जायज थे या नाजायज का सिद्धांत राजनीति के मैदान में प्राय: लागू होता है | अर्थात यदि सफलता मिल जाए तब तो चाल नेकनीयती से भरी और सोच -- समझकर चली गयी कहलाती है और यदि असफलता मिले तो बस फिर कुछ भी नही | नेताओं को बेवकूफ , बदनीयत आदि खिताब मिलते है | यही बात यहाँ हम देखते है | जो चाल बाबा रामसिंह ने अपने आन्दोलन से बचने के लिए चली , वह कयोंकि सफल नही हुई , इसीलिए अब कोई उन्हें कायर और बुजदिल कहता है और कोई बदनीयत व कमजोर बताता है | खैरहम तो समझते है कि वह राजनीति के एक चाल थी | उन्होंने पुलिस को खबर कर दी ताकि वे कोई ऐसा इलाज कर ले जिससे कोई बड़ी खराबी पैदा न हो , लेकिन सरकार उनके इस भारी आन्दोलन से डरती थी और उसे पीस देने का अवसर खोज रही थी | उसने कोई ख़ास कार्यवाही न की और उन्हें मर्जी अनुसार जाने दिया |लेकिन 11 जनवरी के पात्र में डिप्टी कमिश्नर लुधियाना मि कावन कमिशनर को लिख भेजी कि रामसिंह ने उन लोगो से अपने सम्बन्ध न होने की बात जाहिर की है और उनके सम्बन्ध में हमे सावधान भी कर दिया है | खैर वे 150 नामधारी सिंह बड़े जोश -- खरोश में चल पड़े |जब वे 150 व्यक्ति वह से बदला लेने के विचार से चल पड़े तो पुलिस को पहले से बताया जा चुका था , लेकिन सरकार ने कोई इंतजाम नही किया | क्यों ? कयोकी वे चाहते थे कि कोई छोटी -- मोटी गड़बड़ हो जाए , जिससे कि वे उस आन्दोलन को पीस दे | सो वह अब मिल गया | वे कूके वीर उस दिन तो पटियाला राज्य की सीमा पर एक गाँव रब्बो में पड़े रहे | अगले दिन भी वही टिके रहे | 14 जनवरी 1872 की शाम को उन्होंने मलोध के किले पर धावा बोल दिया | यह किला कुछ सिक्ख सरदारों का था , लेकिन इस पर हमला क्यों किया ? इस सम्बन्ध में डिस्ट्रिक गजेटियर में लिखा है कि उन्हें उम्मीद थी कि मलोध सरकार उनके विरोध की नेता बनेगी , लेकिन उन्होंने मना कर दिया और इन्होने हमला कर दिया | बहुत संभव है कि बाबा रामसिंह की बड़ी भारी तयारी में मलोध सरकार ने मदद देने का वादा किया हो , लेकिन जब उन्होंने देखा कि विद्रोह तो पहले से ही हो गया है और बाबा रामसिंह भी साथ नही है और पूरी संगत भी नही बुलाई गयी है तो उन्होंने मना कर दिया होगा | खैर! जो भो वह लड़ाई हुई | कुछ घोड़े हथियार और तोपे ले वे वह से चले गये | दोनों ओर के दो -- दो आदमी मारे गये और कुछ घायल हुए |अगले दिन सवेरे 7 बजे वे मलेर कोटला पंहुचे गये |अंग्रेजी सरकार ने मलेर कोटला सरकार को पहले सूचित कर रखा था | उपर बड़ी तैयारिया की गयी थी | सेना हथियार लिए कड़ी थी लेकिन इन लोगो ने इतने बहादुरी से हमला किया कि सेना और पुलिस में कुछ वश न रहा | हमला कर वे शहर में घुस गये और जाकर महल पर हमला कर दिया | वह भी सेना उन्हें नही रोक पायी | वे जाकर खजाना लूटने की कोशिश करने लगे | लूट ही लिया जाता , लेकिन दुर्भाग्य से वे एक और दरवाजा तोड़ते रहे जिससे कि उनका बहुत -- सा समय नष्ट हो गया और भीतर से कुछ भी न मिला | उधर से सेना ने बड़े जोर से धावा बोल दिया | आखिर लड़ते -- लड़ते वहा से लौटना पडा | उस लड़ाई में उन्होंने 8 सिपाही मारे और 15 को घायल हो गये | उनके सात आदमी मारे गये | वहा से भी कुछ हथियार और घोड़े लेकर भाग निकले | आगे -- आगे वे और पीछे -- पीछे मलेर कोटला की सेना |वे भागते जा रहे थे | और लड़ते जा रहे थे | उनके और कई आदमी घायल हो गये और वे उन्हें भी साथ ही उठा ले जाते थे | आखिर कार पटियाला राज्य के रुड गाँव में ये पहुंचे और जंगल में छिप गये | कुछ घंटो के बाद शिवपुर के नाजिम ने फिर हमला बोल दिया | लड़ाई छिड़ गयी पर बेचारे कूके थके -- हारे थे | आखिर 68 व्यक्ति पकड लिए गये | उनमे से दो औरते थी , वे पटियाला राज को दे दी गयी |अगले दिन मलेर कोटला लाकर तोप गाड दी गयी और एक -- एक कर 50 कूके वीर तोप के आगे बाँध -- बंद कर उड़ा दिए गये | हरेक बहादूरी से अपनी -- अपनी बारी पर तोप के आगे झुक जाता और सतत श्री अकाल कहता हुआ तोप से उड जाता | फिर कुछ पता नही चलता कि वह किस संसार में चला गया | इस तरह 49 व्यक्ति उड़ा दिए गये | पचासवा एक तेरह साल का लड़का था | उसके पास झुकर डीपटी कमिशनर ने कहा कि बेवकूफ रामसिंह का साथ छोड़ दे , तुम्हे माफ़ कर दिया जाएगा | लेकिन वह बालक यह बात सहन नही कर सका और उछलकर उसने कावन की दाढ़ी पकड ली और तब तक नही छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ न काट दिए गये | बाकी 16 आदमी अगले दिन मलोध जाकर फांसी पर लटका दिए गये | उधर बाबा रामसिंह को उनके चार सूबों के साथ गिरफ्तार करके पहले इलाहाबाद और बाद में रंगून भेज दिया गया | यह गिरफ्तारी ( रेगुलेशन ) 1818 के अनुसार हुई |जब यह खबर देश में फैली तो और लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या बना | विद्रोह शुरू करके बाबा जी ने हमे भी क्यों न बुलाया और सैकड़ो लोग घर -- बार छोड़कर भैणी की ओर चल पड़े | एक गिरोह जिसमे १७२ आदमी थी , कर्नल वायली से मिला | वह अधीक्षक था | उसने झट उन्हें भी गिरफ्तार करवा लिया | उनमे से 120 को तो घरो को लौटा दिया , लेकिन 50 ऐसे थे कि कोई घरबार नही था | वे सब सम्पत्ति आदि बेचकर लड़ने -- मरने के लिए तैयार थे | उन्हें जेल में डाल दिया | इस तरह वह आन्दोलन दबा दिया गया और बाबा रामसिंह का पूरा यत्न निष्फल हो गया | बाद में देश में जितने कूके थे वे सभी एक तरह से नजरबंद कर दिए गये | उनकी हाजरी ली जाती थी | भैणी साहिब में आम लोग का आना -- जाना बंद कर दिया गया | ये बंदिशे 1920 में आकर हटाई गयी | यही पंजाब की आजादी के लिए दी गयी सबसे पहली कोशिश का संक्षित इतिहास है |................................... .......सुनील दत्ता ...पत्रकार

महान वैज्ञानिक गैलिलियो

उनकी इस देंन के लिए मानव जाति उनकी ऋणी है और ऋणी रहेगी - महान वैज्ञानिक गैलिलियो
( दीवाल घड़ी के पेन्डुलम , प्लस मीटर ( नाडी स्पन्दनमापी ) , प्रारम्भिक थर्मामीटर ,
दूरदर्शी ( टेलिस्कोप ) के महान आविष्कारक गैलिलियो )
गैलिलियो का पूरा नाम गैलिलियो गैलिली था | उनका जन्म 14 फरवरी 1564 में इटली के पीसा नगर में हुआ था | पीसा नगर दुनिया के आश्चर्यजनक निर्माणों में शामिल -- पीसा के मीनार है , जो एक ओर झुकी हुई है | गैलिलियो के पिता अपने समय के विद्वान् थे और वे गैलिलियो को डाक्टर बनाना चाहते थे | लेकिन बचपन से उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा उन्हें एक अन्वेषक व् वैज्ञानिक बनाने का यतन करने लग गयी थी | किशोरावस्था में ही उन्होंने पेन्डुलम का सिद्दांत प्रस्तुत कर दिया | उसकी शुरुआत गिरजाघर में हुई , जहा वे प्रार्थना के लिए गये थे | गिरजा घर में जंजीर के सहारे एक बड़ा लैम्प लटका हुआ था | हवा के झोके के साथ लैम्प कभी दूर और कभी थोड़ा नजदीक जाकर पुन: अपनी जगह लौट आता था | गैलिलियो ने इस बात को ध्यान से देखा कि चाहे वह लैम्प ज्यादा दूर जाए चाहे कम उसे अपनी जगह वापस आने में उतना ही समय लगता है | समय में कोई अंतर नही आता | गिरजाघर में लैम्प के दूर और नजदीक से वापस आने का समय नोट करने के लिए गैलिलियो ने अपनी नाडी का गति सहारा लिया था | क्योकि उस समय तक समय मापने के लिए घडियो का प्रचलन नही पाया था | इस तरह से गैलिलियो ने अपनी इस खोज से जहा समय मापने के लिए पेन्डुलम की खोज कर दी , वही और उसी के साथ ही नाडी के गति मापने के लिए वे प्लस मीटर के रचना करने में सफल हुए | बाद में गैलिलियो के पुत्र विन्सेजी ने इसी आधार पर समय की माप के लिए पेन्डुलम वाली दीवाल घडियो के कई माडल बनाये | गैलिलियो ने अरस्तु के कथन अनुसार पूरे समाज में प्रचलित इस अवधारणा को भी गलत साबित कर दिया कि अगर दो असमान भार के अर्थात भारी और हल्के वजन के वस्तुओ को एक ही उचाई से गिराया जाए , तो भारी वजन वाली वस्तु पहले और हल्की वजन की वस्तु बाद में जमीन में गिरेगी | गैलिलियो ने दावा किया कि यह बात गलत है | दोनों एक ही समय में जमीन पर गिरेगी | इसे साबित करने के लिए गैलिलियो ने पीसा के मीनार को चुना | वहा के लोग भी इसे देखने के लिए मीनार के नीचे खड़े थे कि क्या गैलिलियो का कहना सही है और उनका आज तक का ज्ञान व विश्वास गलत है ? गैलिलियो ने मीनार की सबसे उची मंजिल से दो असमान भार के गोलों को एक साथ नीचे गिरा दिया | लोग यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि दोनों गोले एक ही साथ पृथ्वी पर गिरे | गैलिलियो का कथन सही और लोगो का अपना ज्ञान -- विश्वास झूठा साबित हुआ | गैलिलियो का यह प्रयोग वस्तुत: उनके पृथ्वी के गुरत्वाकर्षण के उस समय के वौज्ञानिक समझ को प्रदर्शित करता है जिसको अपने पूरे वैज्ञानिक खोज व सिद्दांत के साथ न्यूटन ने लगभग सौ वर्ष बाद प्रस्तुत किया | गैलिलियो ने अपने विद्यार्थी जीवन में गणित के शिक्षा प्राप्त की और बाद में पिडुआ विश्वविद्यालय में गणित के प्राध्यापक भी बन गये | लेकिन प्राकृतिक घटनाओं और उसके रहस्यों की वैज्ञानिक खोज में वे लगातार लगे रहे | गैलिलियो का तीसरा बड़ा वैज्ञानिक आविष्कार शरीर का ताप मापने वाले प्रारम्भिक थर्मामीटर के निर्माण का रहा है | उनके द्वारा बनाया गया प्रारम्भिक थर्मामीटर का नाम वाटर थ्रमोस्कोप था | इसमें पारे के जगह पानी का उपयोग किया गया था | बाद की शताब्दियों में कई बार सुधार करते हुए इसे आधुनिक थर्मामीटर के रूप में प्रस्तुत किया गया | गैलिलियो ने दूरदर्शी यंत्र के रूप में अपना सबसे बड़ा और महान आविष्कार किया | उन्होंने लगातार और बड़ी मेहनत से ताबे के नलकी के दोनों सिरों पर दूर तक दिखाई पड़ने वाली शीशो को फिट कर संसार के पहले सफल दूरबीन का ईजाद किया | दूरबीन के इस आविष्कार के बाद तो इटली में मानो भूचाल सा आ गया | इसे देखने व जानने के लिए वहा के राजा से लेकर समूचा अभिजात वर्ग उतावला हो उठा पीसा की मीनार पर चढ़कर लोगो ने इस दूरबीन के जरिये दूर समुन्द्र में खड़े जहाजो को उनके वास्तविक दूरी से दस गुना समीप देखा | बाद के दौर में भी गैलिलियो अपनी दूरबीन को विकसित करते रहे | अपने इन्ही प्रयत्नों से बाद में उन्होंने ऐसी दूरबीन बनाई जिससे चाँद -- सितारों को भी देखा जा सकता था | उन्होंने इस दूरबीन की सहायता से आकाशीय रहस्यों का अध्ययन लगातार जारी रखा | लोगो का विचार था कि चाँद -- सितारे चमकदार धातु छोटे बड़े टुकड़े है जिन्हें आकाश में जड़ दिया गया है और उनमे कई सितारे तो पृथ्वी और सूरज से भी बड़े है | अपने इसी यंत्र से गैलिलियो ने अपने से पहले महान वैज्ञानिक कापर निकस के विचारो के पुष्टि भी की | कापर निकस का कहना था कि ब्रह्माण्ड का केन्द्र सूर्य है न कि पृथ्वी | इसीलिए पृथ्वी समेत ब्रह्माण्ड के सभी ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते रहते है | यह अवधारणा वहा ( और इस देश में भी ) प्रचलित अवधारणाओ धार्मिक शिक्षाओं के एकदम विपरीत थी | क्योकि इन अवधारणाओ शिक्षाओं अनुसार सूर्य पृथ्वी के चारो ओर चक्कर काटता है जैसे कि हमे दिखाई भी पड़ता है | सूर्य के स्थिरता तथा उसके चारो ओर पृथ्वी के घुमने के सिद्दांत का प्रतिपादन करने के बाद 1616 में उनके इस प्रतिपादन को धार्मिक विश्वासों के विपरीत घोषित कर दिया गया | इसका अभियोग भी गैलिलियो पर लगाया गया | इस अभियोग को लेकर गैलिलियो को चर्च के पादरी व अन्य धर्माधिकारियो के समक्ष प्रस्तुत होना पडा | धार्मिक संस्थाओं तथा सरकार द्वारा उन्हें अपने इस सिद्दांत को कहने बताने पर रोक लगा दी गयी | 1630 तक गैलिलियो ने इस संदर्भ में कोई बात नही की | लेकिन उसके बाद उन्होंने अपनी पुस्तक '' डायलाग्स क्न्सर्निग टू प्रिसंपल सिस्टम आफ दी वर्ल्ड '' में उन्होंने पुआरनी मान्यता और अपनी नई खोज को एकदम स्पष्ट रूप से प्रकाशित कर दिया | इसी आधार पर उन पर पुन: अभियोग लगाया गया और 70 वर्ष के बूढ़े गैलिलियो को पुन: अदालत आना पडा | धर्माधिकारियो और राज्याधिकारियो ने उन पर दवाव डाला कि अगर वह अपने कथन को झूठा मान ले तो उन्हें माफ़ किया जा सकता है | गैलिलियो अपने सिद्दांत को नकारने के लिए खड़े भी हुए , पर पृथ्वी की ओर देखते हुए धीमे से कहा कि ' पृथ्वी अभी भी सूर्य के चारो ओर घूम रही है | उन्होंने पृथ्वी की ओर देखते हुए धीमे स्वर में पुन: यही दोहराया | फलस्वरूप गैलिलियो को कैद में रखे जाने की सजा हुई | लगभग सात साल बाद अत्यंत वृद्द एवं कमजोर हो गये गैलिलियो को कारागार से मुक्ति मिली | बाद में उनकी आखो की रौशनी जाती रही और 1642 में उनका देहान्त हो गया | लेकिन मानव जाति को दिया गया यह अनमोल अन्वेषण उसके अन्वेषक को सदा सदा के लिए अमर कर दिया | उनकी इस देंन के लिए मानव जाति उनकी ऋणी है और ऋणी रहेगी ................................. ..सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

आरगम -सांस्कृतिक मंच नही यह एक लोक जनान्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन की धारा है

'' तुम किसी से रास्ता न मागना - तुम पवन की तरह गुजर जाना ''
आरगम 2013 एक नया संकल्प --- लोक जन आन्दोलन , जन संस्कृति , लोक रंग , लोक भाषा का ठेढ़े - मेढ़े कंकरीले , पथरीले जमीन पर लोक रंग , लोक नाट्य जैसी विलुप्त होतो विविध कलाओं को सहेजने के साथ ही भारतीय रंग पटल पर एक जन आन्दोलन , सांस्कृतिक आन्दोलन को दिशा और दशा देते हुए अबाध गति से '' सूत्रधार '' विगत दस वर्षो से सक्रिय लोक नाट्य व लोक रंग आन्दोलन के क्रम में '' आरगम '' 2013 ने स्त्री विमर्श पर प्रश्न खड़ा करने में सफल रहा है | संस्कृति के आलोक को अपने चतुर्दिक प्रकाश फैलाता , घुमक्कड़ शास्त्र के रचयिता महा पंडित राहुल सांकृत्यायन , उर्दू - फ़ारसी अदब के तवारीख अल्लामा शिब्ली नोमानी , नुरजहा जैसा महाकाव्य के प्रणेता गुरु भक्त सिंह भक्त , प्रथम खड़ी बोली के महाकाव्य '' प्रिय प्रवास '' के सर्जक के नाम पर स्थापित '' सांस्कृतिक आन्दोलन '' के गौरवशाली इतिहास को अपने पन्नो पर दर्ज करता हुआ निरंतर जन आन्दोलन को प्रवाह देने वाला खण्डहर होता हरिऔध कला भवन के प्रागण में ''बाजारवादी -- उपभोक्तावादी संस्कृति के विरुद्द लोक संस्कृति के विस्तार को गति देता '' आरगम '' का बसाया कला ग्राम बहुत से अनछुए प्रश्न भी छोड़ गया | भारतवर्ष में प्रत्येक प्रदेश की अपनी सांस्कृतिक -- सामाजिक विशेषताए है जो मुख्यत: वहा के लोक - संगीत - लोक नाट्य के माध्यम से व्यक्त होती है | परम्परा के प्रवाह में गतिशील लोक संगीत - लोक नाट्य से ही उस क्षेत्र -- विशेष की राष्ट्रीय - अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनती है | ये लोक विधाए ही किसी सर्जक हाथो में सवकर शास्त्रीय विधाओं का आकार ग्रहण कर लेती है | यह एक बड़ी सच्चाई है कि लोक संगीत ही शास्त्रीय संगीत का प्रेरणा दाई आधारभूत उपादान है | विद्यापति की पदावली लोक भाषा तथा लोक संगीत में रची - पगी है - जिससे वे मैथिल कोकिल बने | जयदेव के गीत -- गोविन्द में भी लोक गीतों जैसी सहजता , मधूरता तथा लयात्मकता है | कबीर - सुर - तुलसी - मीरा - सभी के गीतों पर लोक शैली की स्पष्ट छाप विद्यमान है | उत्तर प्रदेश में लोक कलाओ और लोक संगीत के अमूल्य धरोहर विद्यमान है | भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है कविवर सुमित्रा नन्दन पन्त के शब्दों में '' भारतमाता ग्रामवासिनी '' है | दूसरे शब्दों में भारत की आत्मा गाँवों में बसती है | उसका हृदय स्पन्दन गाँवों में धडकता है | उसकी उदात्त भावनाओं और उसके हर्षोउल्लास , आशाओं , आकक्षाओ के स्वर ग्राम वासियों के कोटि - कोटि कंठो से मुखरित होते है और इसी से जन्म होता है ''हमारी लोक कला और लोक संस्कृति का '' | बाजारवादी संस्कृति के पश्चात लोगो में गाँवो से शहरों की ओर पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है और एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ है जो गाँवों से पूरी तरह कट गया है | नगरो की ओर पलायन पर अंकुश लगाकर गाँवों के खुशाहली और सुख समृद्दी का पथ प्रशस्त करने के लिए गाँवों में पुष्पित और पल्लवित होने वाली लोक कलाओं और लोक संस्कृति के प्रति लोगो के अभिरुचि पुन: जागृत करने और अपनी इस विरासत को अधिक समृद्द बनाने के इस आन्दोलन में आरगम 2013 के लोक संस्कृति - लोक नाट्य भारत की आधी आबादी '' नारी '' पर समर्पित रहा | चार दिनों के आरगम में प्रति दिन दो सत्र में बाटागया था पहला सत्र लोकसंगीत , लोकनृत्य व दूसरा सत्र नारी पर समर्पित और नारी शोषण पर आधारित विषय पर नाटको का मंचन - आरगम का प्रथम दिन के प्रथम सत्र में उदघाटन के पश्चात अपनी माटी के संस्कारो के साथ विरह की वेदना समेटे विरहा से इसकी शुरुआत हुई उसके बाद लोकपरम्परा में विलुप्त होती धोबिया व जाघिया नृत्य के गीतों ने आम जनमानस को एक बार फिर उसी पुरानी अपनी लोक शैली को उनके सामने जीवंत बना दिया और वो महसूस करते रहे हम किसी शहर में नही हम गाँव के किसी अमराई तले बैठे अपनी पुरानी मान्यताओं को देख रहे है | दूसरे सत्र में अभिषेक पंडित कृत व निर्देशित नाटक '' नजर लागी रामा '' का मंचन हुआ | समय समाज के मूल्याकन में सांस्कृतिक स्थिति महत्वपूर्ण होती है इसमें बिखराव या संगठन पर इंसानी जेहन का अंदाजा किया जा सकता है आज की समस्या है कि इंसानों के व्यवहार का भरोसा टूट रहा है | वह स्टाक एक्सचेंज की तरह त्वरित लाभ - हानि के आकलन में गिरता उठता है ऐसे ही समस्याओ के प्रति संकेत करता नाटक '' नजर लागी रामा '' में निर्देशक ने ब्रेख्तियन शैली का प्रयोग बड़ी खूबसूरती से किया है | इसका मूल कथानक लोक कथा पर आधारित है वो कथा आज भी समाज में प्रासंगिक है एक चरवाहा अपनी पत्नी के लिए रजा के महल में घुसकर रानी के आभूषण चरता है | पर रानी की विद्वता पर वो चरवाहा मोहित हो जाता है उसके बाद अपनी पत्नी की मुर्खता पर उसे गुस्सा आता है वो पुन: राजा के दरबार में जाकर उन आभुष्ण को लौटाता है अंत में राजा चरवाहे को मौत की सजा सुनाता है | राजा की भूमिका में अरविन्द चौरसिया ने सहज अभिनय किया रानी के भूमिका में मनन पाण्डेय ने सार्थक भूमिका करके दर्शको का मन मोह लिया चरवाहा और उसकी पत्नी की भूमिका में हरिकेश मौर्या व अंकित सिंह थे नाटक अपनी प्रस्तुती में अपने प्रश्नों को दर्शको के सामने छोड़ने में सफल रहा इसका संगीत पक्ष बहुत प्रभावशाली रहा इस पक्ष को अंकित सिंह ' सनी ने सम्भाला था | राजस्थान की माटी की सुगंध बिखेरी वहा के लोक कलाकारों ने कालबेलिया नृत्य के द्वारा उन्होंने खत्म हो रही हमारी पुरानी लोक परम्पराओं को जहा गीतों के माध्यम से प्रदर्शित किया वही अपने करतब से लोगो को आश्चर्य चकित कर दिया इसके साथ ही परदेशी बालम पधारो मारो देश के बोल के जरिये भारत की अपनी स्वागत की संस्कृति का बोध कराया आरगम का दूसरा दिन पहला सत्र संगोष्ठी '' आज की औरत और उसकी चुनौतिया '' के बाद मराठी लोक नृत्य व कौमी एकता पर नृत्य नाटिका के साथ ही हमारे हरियाणा से आये लोक कलाकारों ने हरियाणवी लोक कला के माध्यम से यह बताया कि हम अपनी परम्पराव , मान्यताओं को नही बदल सकते है उनको साथ लेकर हम आधुनिकता के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे पर हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है वही हमारा अस्तित्व है दूसरे सत्र में पटना की '' कला संगम '' द्वारा भीष्म साहनी की कहानी पर आधारित '' साग - मीट '' नाटक की चर्चा करते - करते एक महिला अपनी पड़ोसन को अपने नौकर '' जग्गा '' के बारे में बताती है जग्गा बचपन से ही उसके यहाँ नौकर था बहुत ईमानदार , सीधा और मेहनती बड़ा होकर वह शादी करके अपनी पत्नी के साथ ही रहता है , दोनों इस घर की सेवा करते है , घर का मालिक किसी दफ्तर का बड़ा अफसर है मालिक का भाई ' जग्गा ' की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसकी पत्नी का योंन शोषण करता है , यह बात जब महिला को पता चलता है तो वह अपने पति से यह बात बताना चाहती है इसी बीच जग्गा मालिक के भाई को एक दिन अचानक अपनी कोठरी से निकलते देख लेता है यह घटना भी वो घर कि मालकिन अपनी आखो से देख लेती है वह फिर वह तय करती है कि वो अपने पति से इस घटना की चर्चा करेगी लेकिन इसी बीच जग्गा आत्महत्या कर लेता है , पुलिस को आत्महत्या के बारे में कुछ सुराग नही मिल पाता है और मामला रफा - दफा हो जाता है एक दिन वह अपने पति से सारी घटना का जिक्र करती है परन्तु अपने पति के मुह से यह जाकर कि उसे पहले सी ही सारी बातो का पता है वह अवाक रह जाती है मालिक जग्गा के घर के लोगो को पैसा देता है वह यह सोचता है कि कुछ पैसे दे देने से गरीबो का मुह बंद हो जाता है | निर्देशक ने बड़ी ही बारीकी से महानगरो के अपसंस्कृति की ओर इशारा करते हुए यह बताने के कोशिश की है कि किस तरह ये नव धनाढ्य वर्ग आज भी नारी का शोषण करते चले आ रहे है | मोना झा ने अपने एकल अभिनय से सारे पात्रो को जीवंत बना दिया '' साग मीट '' दर्शको के समक्ष बड़ा सवाल छोड़ गया
आरगम का तीसरा दिन '' इस बार आरगम ने एक नया प्रयोग किया गया जिसमे हमारे भारतीय वाद्ययंत्रो का शास्त्रीय पक्ष भी लोगो के बीच लाने का प्रयास किया गया | एकल शहनाई ,, पखावज , तबला सितार बासुरी वादन के जरिये इस एकल कलाकारों ने आरगम के पूरे बौद्दिक समाज को अपने इस फन से बाधे रखा | पंजतन ने शहनाई से जब अपनी मधुर तान छेड़ी तो अनायास ही बिस्मिल्ला खा साहब याद आ गये |तबले ने भी अपनी थाप से लोगो को मोहित किया | अजय सिंह ने अपने बासुरी के स्वर से राधे कृष्ण के याद दिला दी दूसरा सत्र भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर को समर्पित था | बताते चले भिखारी ठाकुर अपने जीवन काल में ही ( भोजपुरी समाज के मिथक बन चुके थे ) पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोक संस्कृति के पहचान भिखारी ठाकुर से होती है उनके बिना भोजपुरी -- भाषी समाज की कल्पना असम्भव है | भिखारी ठाकुर उस दौर के उपज थे जब राजनीति के साथ आर्थिक विषमताओ और सामन्ती संस्कृति से जकड़े ग्रामीण समाज में एक तीव्र बेचैनी और छटपटाहट थी | उसी को भिखारी ठाकुर ने अपने गीतों और नाटको में रेखांकित किया है |
संकल्प बलिया की प्रस्तुति -- भिखारी ठाकुर की अमर कृति '' गबरघिचोर'' , रोजगार के अभाव में युवाओं का गांव से शहर की ओर पलायन व स्त्री संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है। गलीज नाम का पात्र अपनी पत्नी को छोड़कर शहर कमाने चला जाता है इधर ऊसकी पत्नी का गांव के एक युवक गलीज से संबंध हो जाता है जिससे उसको एक लड़का होता है जिसका नाम है गबरघिचोर । जब गलीज को इस बात का पता चलता है तो वह लड़के को ले जाने के लीए गांव आता है । लड़के को लेकर पत्नी से लड़ाई होती है तब तक गड़बड़ी आ जाता है और कहता है कि लड़का हमारा है तीनों में झगड़ होता है । लड़का किसका है इस बात का फैसला करने के लिए पंच को बुलाया जाता है पहले तो लालच में फंस कर पंच बेतुका फैसला दैता है कि लड़के को तीन टुकड़े में काट कर तीनों में बांट दिया जाय , यह फैसला सुनकर मां बिलख पड़ती है तब पंच का विवेक जागता है और वह फैसला सुनाता है कि वास्तव में लड़के पर मां का हक है जिसने इसे नौ माह तक अपने गर्भ में रखा और पैदा होने पर उसे पाल पोसकर बड़ा किया । इस तरह एक महिला संघर्ष करके जीतती है । इस पूरे नाटक में आज भी स्त्री पर हो रहे अनाचार को उद्घाटित करके दर्शको के मन मष्तिष्क को झकझोरने का काम किया पंच की भुमिका रेनू सिंह , ने सार्थक अभिनय से दर्शको को सोचने पर मजबूर कर दिया | इसके साथ ही अन्य पात्रो ने भी अच्छा अभिनय किया नाटक का संगीत पक्ष बहुत ही मजबूत रहा जिससे नाटक के सम्प्रेषण को दर्शको तक पहुचाने में निर्देशक कामयाब रहा संगीत, गायन- ओम प्रकाश , सोनू । संगीत निर्देशन-शैलेन्द्र मिश्र ,इसका निर्देशन -रेनू सिंह . मंच परिकल्पऩा व निर्देशकीय सहयोग-आशीष त्रिवेदी ।
आरगम का आखरी दिन आजमगढ़ के एक मस्त मौला फकीर पेशे से दर्जी '' हादी आजमी '' के उन दर्द भरे नज्मो से कार्यक्रम की शुरुआत हुई जिसमे उन्होंने आम आदमी होने के दर्द को बया किया है और इसको अपना स्वर दिया पंडित विनम्र शुक्ल ने उनके रिदम ये एहसास दिला दिए हादी आजमी के उस दर्द को जो उन्होंने अपने नज्मो में उकेरी है | इसके साथ ही आजमगढ़ से उभरता एक सितारा अंकित सिंह '' सनी '' जो गजल , गीत हो या शास्त्रीय संगीत का ठुमरी हो , दादरा हो उसने अपने गायकी से यह सिद्द कर दिया कि वो आने वाले कल का बेहतरीन सितारा है \ लोक रंग के इस आखरी शाम को '' इन्द्रवती नाट्य समिति '' सीधी मध्य प्रदेश की प्रस्तुती नाटक '' स्वेच्छा '' स्वेच्छा एक ऐसी लडकी की कथा है जो लगातार अपने अस्तित्व के तलाश में संघर्षशील है | लडकी का बचपन तरह - तरह के चरित्रों को महसूस करता है उन्हें समझते या उनका रूप ग्रहण करते बीतता है यह बात और है कि इन दिनों वो अपनी मर्जी का ऐसा कुछ भी नही कर पाती लेकिन कही न कही उसके आगामी जीवन पर उन चरित्रों का गहरा प्रभाव पडा है | अब वो बड़ी हो गयी है उसके सारे बचपन के दिनों के कोमल चरित्र अब बड़े हो गये है वो तमाम दुनियावी उतार -- चढाव से वाफिक होने लगे है यह बात अब माँ बाप को ठीक नही लगती है लेकिन स्वेच्छा के चरित्र बुनने और उनके बीच रहना ही अच्छा लगता है स्वेच्छा सूरज की पहली किरण लाल अरुण के यात्रा से शुरू होकर अस्त होते सूरज तक का सफर है | सफर वो जो कभी न खत्म न हो अनंत के ओर उन्मुख हो जिसकी पैदाइश ही प्रेम हो | कुछ ऐसे ही विचारधारा और चाहत को प्रगट करती है श्वेच्छा | यू तो आदमी वास्तविक जीवन में हजारो चरित्रों को जीता रहता है | लेकिन जब इन चरित्रों के मध्य जिन्दगी जीने की बात आती है इन्ही चरित्रों के साथ सपने देखने की बात आती है तो हम कतराते है तब हमे रंगों से और रंगो में शामिल चरित्रों से उबन होने लगती है और न जाने किस जीवन दर्शन में डूबने उतराने लगते है | जहा शब्दों के मायने बदल जाते है | जरा सोचे क्या हम नन्ही मासूम शक्लो को गुमराह नही कर रहे होते ऐसी स्थिति में सब कुछ अधूरा रह जाता है विशाल अधूरापन मुहँ फैलाए खड़ा होता है हमारा अस्तित्व लीलने को और हम बची -- खुची जिन्दगी न चाहते हुए भी जीते चले जाते है | घिसटते चले जाते है अनायास ही मौत के मुहाने तक इस नाटक को निर्देशक ने अपने सम्पूर्ण कला दर्शन के जरिये एक मूर्त रूप में आकृति सिंह के जरिये साकार किया इस छोटी सी कलाकार ने अपने शानदार अभिनय से इस पुरे कथानक को साकार स्वरूप देकर दर्शको को निशब्द: बाधे रखा यही उसकी बहुत बड़ी सफलता रही | नाटक का निर्देशन व संगीत निर्देशन नरेन्द्र बहादुर सिंह ने किया था वो अपने नाटक के माध्यम से आज के समय की त्रासदी को बखूबी कह गये | इन चार दिनों के कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी व स्वतंत्र पत्रकार , समीक्षक एस . के दत्ता ने सफलता पूर्वक सम्पन्न किया | कार्यक्रम के अंत में समाज के विभिन्न क्षेत्रो में कार्य करने वालो को सम्मानित किया गया | वर्ष 2013 आरगम के सयोजक ममता पंडित ने अपने कुशल संचालन से इसे सफलता की दिशा दी ,इसके साथ ही सूत्रधार संस्था के अध्यक्ष डा सी के त्यागी , सचिव अभिषेक पंडित , व डा बद्रीनाथ , डॉ स्वस्ति सिंह , श्रीमती विनीता श्रीवास्तव , प्रवीन सिंह , नित्यानंद मिश्र , दीप नारायण , मनीष तिवारी , विश्वजीत सिंह पालीवाल , जनहित इंडिया के सम्पादक मदन मोहन पाण्डेय और साथ के सभी रंगकर्मीयो के समर्पण से ही यह जन आदोलन , रंग आन्दोलन निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है |
अश्वघोष की इन पक्तियों के साथ -------- अभी तो लड़ना है तब तक जब तक मायूस रहेंगे फूल तितलियों को नहीं मिलेगा हक़ जब तक अपनी जड़ों में नहीं लौटेंगे पेड़..........................
-- सुनील दत्ता --- स्वतंत्र पत्रकार ए समीक्षक