हाकिमे शहर तेरी तलवार की फलयों से, किसी मज़लूम के खून की बू आती है।।

आम आदमी अपने को वोट की भागीदारी या इससे ज्यादा पार्टियों के नेताओं के समर्थन या विरोध की चर्चा तक ही अपने आप को सीमित रखता है | आम आदमी स्वंय राजनीति करने व्यवस्था में शासक -- संचालक बनने के लिए आगे नही आ रहा है | ऐसा करने में अक्षम समझता है आम आदमी समाज राष्ट्र व समाज का बहुसंख्यक हिस्सा है | इनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य शारीरिक एवं मानसिक मेहनत के जरिये अपने परिवार का भरण -- पोषण ही उसका लक्ष्य होता है | इसको वह अपना कर्तव्य समझता है और जीवन पर्यन्त इसी में संघर्षरत रहता है | आम समाज अपने में एक जैसा यू कह सकते है कि एक रूपता का समाज नही है बल्कि वह विभिन्न धर्म , सम्प्रदाय जाति इलाके व नस्ल भाषा की पहचान के साथ -- साथ भिन्न -- भिन्न आर्थिक , सामाजिक स्तरों पर विभाजित समाज है | इस समाज में सीमान्त लघु एवं मध्यम जोत वाले किसानो , तिहाड़ी मजदूर , बुनकरों दस्तकारो के साथ ही छोटे ठेले - गुमटी वालो के साथ साधारण शिक्षा पाए कामगारों से लेकर चिकित्सा , शिक्षा न्याय से जुड़े बहुत से पेशो में बहुसंख्यक लोग जुड़े हुए है | इनके दरम्यान अंतर -- भेदों के वावजूद ये लोग आम समाज के हिस्से है | आम समाज के सभी हिस्से आमतौर पर अपने जीवन में नैतिक मूल्यों का वहन करने में लगे रहते है | इनमे से एक बहुत छोटा हिस्सा ही उच्च मध्यम उच्च हिस्सा बन पाने में सफल रहता है | उसके बाद वह इस समाज का हिस्सा नही रह जाता है | धनाढ्य वर्गो व कम्पनियों की तरह ये न तो देश के संसाधनों के बड़े मालिक है और न ही देश की अर्थव्यवस्था -- अर्थात उत्पादन व्यापार और उपभोग को प्रभावित करने या उसे बदल देने की क्षमता ही रखते है | अगर हम देखे तो पायेगे सैकड़ो की संख्या में अरबपति व खरबपति ही इस देश के संसाधनों के 75 % हिस्से पर प्रत्यक्षय -- परोक्ष रूप से मालिकाना हक़ रखते है और संचालन करते है | 75 % आबादी वाले देश के बाकी के 25 % संसाधनों की अत्यंत छोटे व मझोले मालिक है | अपने इस छोटे -- मझोले मालिकाने के या कमाई के अवसरों के संचालक नियंत्रक भी नही है | खासकर पिछले 25 वर्षो में व्यापक जनसाधारण के इन छोटे -- मोटे संसाधनों को जमीन , काम धंधो व रोजगार के भिन्न -- भिन्न साधनों के अवसरों को उनसे लगातार छिना जा रहा है | जिसके चलते आम समाज के हिस्से महगाई , बेरोजगारी की गंम्भीर समस्या सामने खड़ी होती जा रही है | आम समाज इस माने में भी एक जैसा है कि वह राष्ट्र -- समाज का शासक नियंत्रक हिस्सा नही है अपितु वह राष्ट्र का शासित संचालित हिस्सा है | सत्ता सरकारों की योजनाए नीतियों कानूनों को बनाने व लागू करने में आम समाज की कोई भूमिका नही होती है -- जब कि इन नीतियों कानूनों के सभी प्रकार के दुष्परिणाम समाज के इसी तबके पर असर डालते है | इसके सभी सुपरिणाम --- समाज के धनाढ्य व उच्च वर्ग को ही मिलते है | इसका प्रत्यक्ष लाभ सामने देखने को मिल रहा है | पिछले 25 सालो से अमलीजामा पहनाकर लागू की गयी आर्थिक , कुटनीतिक , सांस्कृतिक नीतियों के दुष्परिणाम -- बढ़ते सामाजिक सांस्कृतिक समस्याओं संकटों के रूप में आम जनसाधारण के व्यापक हिस्सों पर पड़ते जा रहे है | बल्कि इसका एक छोटा पार्ट इन्ही नीतियों कानूनों योजनाओं के चलते उच्च माध्यम से उच्च वर्ग बनता जा रहा है | शासन -- प्रशासन व राजनितिक पार्टियों के नेतृत्व में पहुचकर सत्ता सरकार में भागीदारी निभा रहा है और शासक वर्ग बनता जा रहा है | आम समाज अपने चुनावी मताधिकार के जरिये शासक पार्टियों को शासन का अधिकार प्रदान करते रहने का ही एक माध्यम बना हुआ है ठीक उसी तरह से जैसे वह अपने श्रम - शक्ति से अपनी रोजी रोटी कमाने के साथ धनाढ्य मालिको के उत्पादन बाजार को उनके लाभ -- मुनाफे को बढाते जाने का साधन मात्र बना हुआ है | भिन्न -- भिन्न समुदाओ व विभिन्न आर्थिक , सामाजिक स्तरों में रह रहे शिक्षित -- अशिक्षित आम आदमी में इन बातो में भी एक रूपता है कि वह जनसाधारण के हित में समाज का शासक संचालक बनने की इच्छा तक नही रखता है | उनके बारे में चिंतन नही करता | उसकी अपनी सोच -- विचार व क्रिया कलाप आम तौर पर अपने व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है | वह मात्र जीविकोपार्जन के बेहतर साधनों के अवसरों को पाने के बारे में सोचता है | उसके लिए वह धन -- सत्ता के मालिको का सेवक बनने तक ही वह अपने विचारों व्यवहारों को सीमित रखना चाहता है | निजी जीवन की मजबूरियों और अपने स्वार्थ में भी सत्ता सरकारों के प्रति उसमे गुलामो की भावना रहती है | वह सत्ता सरकार तथा शासन -- प्रशासन के विरोध में अपना स्वर तभी निकालता है जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति व पार्टी उसे अपने साथ जोड़ लेती है | अपने स्वार्थी सत्ता राजनीति को आगे बढाने की खातिर आम जनसाधारण या उसके किसी हिस्से को आंदोलित करने के लिए लग जाती है | इसी का परिणाम कि जनसाधारण लोग अपने को वोट की भागीदारी तक या उससे ज्यादा से ज्यादा पार्टियों के नेताओं के समर्थन या उसके विरोध की चर्चा या बक -- बक तक ही सीमित रहते है | उसके आगे स्वंय राजनीति करने समाज का शासक संचालक बनने के लिए आगे नही बढ़ते है | वैसा करने में वह अपने को अक्षम मानते है | यही उनकी बुनियादी कमजोरी है जो वर्तमान युग में भी बनी हुई है | जबकि वह स्वंय वोट देते है और वोट के जरिये सरकार बनाने में सहयोग देते है | साठ वर्ष से उपर बीत चुका है सत्ता शासन के खेल को देखते हुए ये सत्ता और शासन मिलकर इनके हर हक़ और हिस्से को काट रहा है पर अब भी वो लोग खामोश है | वर्तमान दौर के राजनीतिक पार्टिया उसकी केन्द्रीय व प्रांतीय सत्ता सरकारे शासन प्रशासन के उच्च स्तरीय लोभी लोग उसके साथ प्रचार माध्यम विद्वान् व समाज के धनाढ्य के साथ उच्च हिस्से आम आदमी में बढती महगाई बेकारी रोजी रोजगार में आ रही टूटन तथा शिक्षा स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा आदि जैसी बढती जन समस्याओं के प्रति गंम्भीर नही है न ही इसको कोई महत्व दे रही है | उसे घटाने का कोई प्रयास भी नही कर रही है उल्टे उसे बढ़ाने में लगी है | देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो और कम्पनियों के साथ विभिन्न क्षेत्र के उच्च मध्यम तथा मध्यम वर्ग के एक सुविधा प्राप्त छोटे से हिस्से की सेवा में लगी हुई है | धनाढ्य वर्ग को समस्त छूटे प्रोत्साहन और अधिकार प्रदान किये जा रहे है | उसके लिए नई अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों कानूनों को एक के बाद एक लागू करते जा रहे है उसे और भी आगे बढाते जा रहे है | आम आदमी के आधुनिक युग के कम व पेशो को पहचान को धुधला करके उसे धर्म , जाति इलाका भाषा के पहचानो पर बाटने तोड़ने में व एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है | उसके ट्रेड यूनियनों को या किसानो , मजदूरो आदि के जन संगठनों को भी धर्म जाति के नाम पर बाटते जा रहे | ताकि जनसाधारण अपनी समस्याओं व हितो के लिए कही एक जुट न हो जाए | कही एक जुट होकर विद्रोह की भाषा न बोलने लग जाए | यह सारी परस्थितिया आम आदमी को यह चेतावनी भी दे रहा है कि उसकी समस्याओं के लिए समाज का उपरी हिस्सा उनके व्यापक हितो के लिए संघर्ष नही करने वाला है | कारण कि वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय परिस्थितियो में यह बात निश्चित हो चुकी है कि धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों की निरंतर विकास आम आदमी के समाज को संकटग्रस्त किये बिना उनका विकास और समृद्द होना मुमकिन नही है | देश की सता -- सरकारे देश की आम आदमी की साथ प्रतिशत जनसाधारण आबादी के सफाए की सुनिश्चित रणनीती अपनाई हुई है | उसे गरीबी , अभाव , टूटन व असुरक्षा आपदा आदि के संकटों में फंसकर मरने के लिए छोडती जा रही है | अब ऐसा वक्त है कि इस देश की आवाम जो आम आदमी के लिए आवश्यक हो गया है कि विभिन्न समुदायों जनसाधारण तथा विभिन्न आर्थिक जनसमुदाय के व्यापक हितो के लिए उसके रोजी रोजगार काम काज शिक्षा सुरक्षा जैसे आवश्यक जरुरतो के लिए स्वंय चिंतन करे और संगठित हो | इस देश में पिछले बीस सालो से लागू की जा रही जन विरोधी ही नही अपितु जनसंहारक नीतियों के विरोध में संगठित होकर विद्रोह के स्वर फुकने होंगे | अमेरिका ब्रिटेन जैसे विदेशी साम्राज्यी ताकतों व इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो को दी जा रही छुटो अधिकारों के खिलाफ संगठित होना है इसके लिए स्वंय ही आम आदमी को सता शासन में भागीदारी के लिए तैयार होना पड़ेगा | लेकिन एक बात को ध्यान में रखना होगा जनहित के लिए शासक वर्ग बनने के लिए आवश्यक है कि वह धर्म , जाति , क्षेत्र के आपसी अन्तरविरोध को कमतर करने का प्रयास करना होगा और यह कार्य हिन्दू , मुसलमान , सिक्ख , ईसाई व् बड़ी -- छोटी दलित जाति के पहचान को भुलाना होगा इन सबसे उपर उठाना होगा \ तभी हम ऐसे वक्त में इनसे मुकाबला कर सकते है | तुम्हें तो राज हमारे सरों से मिलता है, हमारे वोट हमारे जरों से मिलता है। किसान कहके हिकारत से देखने वाले, तुम्हें अनाज हमारे घरों से मिलता है।। ------
तुम्हारे अज़्म में नफरत की बू आती है, नज़्म व नसक से दूर वहशत की बू आती है। हाकिमे शहर तेरी तलवार की फलयों से, किसी मज़लूम के खून की बू आती है।।
सुनील दत्ता ----- स्वतंत्र पत्रकार , समीक्षक

आजमगढ़ -------- वैभवशाली इतिहास बेबसी भरा वर्तमान


  • भारत वर्ष अपनी विविधताओं के साथ अपना गौरव शाली इतिहास को समेटे रखे हुए है जब भी आप इसके किसी भी पन्ने को खोलेंगे तो ----------
    दरकते हुए पांडूलिपियों के पन्ने अपने आप फडफडा कर अपने इतिहासों के हर पन्ने को आपके सामने खोलता चला जाएगा | ऐसा ही है हमारे आजमगढ़ के इतिहासों में यहाँ बहुत कुछ हुआ है जहा एक ओर हमारे इतिहास का उज्जवल पन्ना है वही पे कुछ ऐसे भी पन्ने शामिल है जिनका वर्णन करना उचित न होगा | आजमगढ़ अपने उन इतिहास के पन्नो पर अपनी वीरता कर्मठता देश भक्ति और राजसी आनबान शानो शौकत को भोगा है वही आज अपनी त्रासदी को चुपचाप मौन देख रहा है | दत्तात्रेय , दुर्वास , चन्द्रमा जैसे देव -- महर्षि ने आखिर तमसा के तट पर ही अपनी तपस्थली कयू बनाई और आजमगढ़ के ऐतिहासिक और पौराणिकता में इसे स्थापित किया | वही हमारा इतिहास बताता है कि कभी बक्सर तक फैली थी मेहनगर राज्य की सीमा मेहनगर और इसके सटे तहसील लालगंज की जमीन अपने में ऐतिहासिकता और वीरता पूर्ण कहानियों को जन्म देती आई है | मुख्यालय से 30 किलोमीटर पर स्थित मेहनगर आजमगढ़ का नाभि -- नाल से जुडा हुआ है 16 वी शदाब्दी के उत्तरार्ध दिल्ली पर मुग़ल बादशाह जहागीर का शासन था 1594 ई में युसूफ खा जौनपुर के सूबेदार नियुक्त हुआ | तब यह इलाका जौनपुर सूबे में ही आता था | फतेहपुर के समीप के राजपूत चन्द्रसेन सिंह के पुत्र अभिमान सिंह उर्फ़ अभिमन्यु सिंह जहागीर की सेना में सिपहसालार थे | उन दिनों जौनपुर सूबे के पूर्वी हिस्से में काफी असंतोष फैला हुआ था | जहागीर ने यह जिम्मेदारी अभिमन्यु सिंह को सौपा वहा की देख रेख करने को अभिमन्यु सिंह ने एक बार नही तीन बार वहा के विद्रोह को समाप्त कर दिया | इस कार्य से प्रसन्न होकर जहागीर ने 1500 घुड़सवार और 92.5000 रुपयों के साथ ही जौनपुर राज्य के पूर्वी इलाको के बाईस परगनों को अभिमन्यु सिंह को सौप दिया | इस जागीर को पाकर अभिमन्यु सिंह ने अपना स्वतंत्र जागीर स्थापित किया और मेहनगर को अपना राजधानी बनाया | बाद में अभिमन्यु सिंह ने परिस्थिति वश इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और उनका नाम दौलत इब्राहिम खा पडा | नि: संतान होने के कारण उन्होंने अपने भतीजे हरिवंश सिंह को अपना राज्याधिकारी बनाया हरिवंश सिंह ने ही मेहनगर का किला बनवाया तथा 20 वर्षो तक राज किया हरिवंश सिंह ने ही हरी बाँध पोखरा , लखराव पोखरा तथा रानी सागर पोखरा बनवाया था | राजा हरिवंश सिंह ने ही अपने चाचा दौलत इब्राहिम खा की याद में 36 दरवाजो वाला मकबरा बनवाया | जो आज भी मेहनगर कस्बे में अपने इतिहास को पुख्ता करते हुए अपने अस्तित्व को बया करती है | यह मकबरा अपने तत्कालीन वास्तु एवं स्थापत्य कला की बेमिशाल कलाकारी का नमूना है | उन दिनों मेहनगर राज्य की सीमा पूरब में बक्सर , पश्चिम में माहुल , दक्षिण में देवगांव , उत्तर में सरजू नदी फैली हुई थी | बाद में हरिबंश सिंह ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया | उनके इस्लाम धर्म को स्वीकारने के कारण इनकी पत्नी रानी ज्योति कुवर सिंह अपने छोटे बेटे धरणीधर सिंह को लेकर चली गयी |जिस स्थान पर वे रहने आई | उसी स्थान को आज रानी की सराय के रूप में हम सब जानते है | बाद के दिनों में रानी के बेटे धरणीधर सिंह ने भी मुस्लिम लड़की से विवाह कर के इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया | उन्ही के के दो पुत्रो ने आजम खा और अजमत खा ने राज्य की बागडोर संभाली \ बार बार विशें राजपूतो के विद्रोह को दबाने के लिए आजम खा ने 1665 ई में आजमगढ़ शहर की स्थापना की और यही पर अपना किला बनवाया |इसके साथ ही उनके भाई अजमत खा ने अजमतगढ़ को बसाया | उक्त शाही वंश के द्वारा बनवाये गये मकबरे , पोखरे , मंदिर और किला का अस्तित्व खतरे में है | मेहनगर के किले का नामो निशाँन कुछ ही दिनों में मिट जाएगा क्योकि उस किले की जमीन पर अधिकतर लोगो ने कब्जा करके मकान और जमीन को अपना बना लिया है और ऐतिहासिक पोखरा लखराव आज वो अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है | लगभग बावन बीखे में स्थित लखराव पोखरा मेहनगर ही नही वर्ण पूर्वांचल का एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है जो अपने आप में सदियों की परम्परा , संस्कृति , संस्कार का इतिहास छिपाए बैठा है लखराव पोखरा अपने आप में अदभुत है | आज से करीब चालीस वर्ष पहले तक इसके पानी से मेहनगर में रहने वाले लोगो के घरो में इसके पानी से भोजन बनता था वही पर वह के मिठाई के दुकानदार उस पानी से छेना फाड़ते थे और मिठाई बनाते रहे है | भयंकर सुखा पड़ने के बाद भी यह पोखरा आज तक कभी सुखा नही है | लोगो का कहना है कि इस पोखरे में पानी पातळ पूरी से आता है अगर इस पोखरे में पानी की अधिकता हो जाती है तो यह पोखरा वीरभानपुर , तिसडा , ह्ठौता, आदि गाँव से होता हुआ मगई नदी में समा कर गंगा में विलीन हो जाता है | लोगो का कहना है की जब तक मेहनगर की टाउन एरिया नही बनी थी तब तक यह ऐतिहासिक पोखरा अपने अस्तित्व के साथ सारे मेहनगर के वासियों को अमृत प्रदान करता था | टाउन एरिया बनने के बाद से ही यहाँ के एक वर्ग द्वारा दबगई से उन भीतो पर कब्जा करता चला आ रहा है और तों एरिया मूक दर्शक बनकर देखता रहा है | इस पोखरे में वहा का सारा प्रदूषित पानी इस पोखरे में आकर मिल जाता है जिससे इस पोखरे का पानी प्रदूषित हो गया है | कभी इस पोखरे के आमने सामने से मंदिर के घंटियों के आवाज और अजान एक साथ हुआ करते थे पर आज वो आवाजे कही गम हो गयी है | अब इस पोखरे के पानी से वजू नही होता है हां महादेव को इस प्रदूषित पानी से उनका पूजा अर्चना आज भी होती है पोखरे में अब स्नान करने के लिए भीड़ नही आती है | नब्बे वर्षीय सुरसती देवी अपने अतीत को याद करते हुए कहती है मैं इस पोखरे में आज सत्तर साल से बिना रोक टोक के बारहों मॉस स्नान करने आती हूँ | पहले कभी यहाँ हर पूर्णमासी को मेला लगता था पर अब सिर्फ विजया दशमी को ही मेला का आयोजन किया जाता है | मनोज कुमार कहते है कि अगर परदेश सरकार द्वारा डा राम मनोहर लोहिया योजना के अंतर्गत इस लखराव पोखरे का सुन्दरीकरण करा दिया जाए तो इस ऐतिहासिक स्थल को अभी भी बचाया जा सकता है उसकी परम्परा और संस्कृति को कायम रखा जा सकता है | इस पोखरे के भीट पर कई प्रकार के जड़ी बतिया पायी जाती है जो गंम्भीर बीमारियों में औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है | आज जरूरत है अपने इस गौरवशाली परम्परा और संस्कृति को बचाने की मेहनगर के सामजिक कार्यकर्ता श्री महेन्द्र मौर्या उर्फ़ बबलू मौर्या कहते है आज हमारे मेहनगर में रहने वाले हर सम्प्रदाय के लोगो का नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम अपने ऐतिहासिक लखराव पोखरे को बचाने के लिए संघर्ष करे ताकि हम अपनी ऐतिहासिक धरोहर को बचा सके |
    सुनील दता --- स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक




बगाल की संस्कृति का आगमन आजमगढ़ तक ----------------

ओकार स्वरूप की अविभाज्य ऊर्जा '' प्रकृति '' के रूप में '' शक्ति ' की उपासना वैदिक काल से प्रचलित रही है | किन्तु '' नव दुर्गा '' रूपायन '' सप्तशती '' मूर्ति स्थापना एवं सामूहिक पूजा -- विसर्जन बाद के यूग की देंन है | अवतारवाद के धारणा के साथ त्रिदेव ( ब्रम्हा , विष्णु , महेश ) तथा बहुदेव ( ग्राम देवता ) कुल देवता आदि की परिकल्पना एवं मान्यताए आई किन्तु शक्ति स्वरूपा दुर्गा सभी परिकल्पनाओं में उपस्थित थी | यही समस्त ब्रह्माण्ड के परिचालन की अजस्र स्रोत है | किन्तु बंगाल की धरती इस उपासना पद्दति की केन्द्र -- बिंदु है | प्राचीन गणराज्य में भी बंगाल का '' काली मन्दिर '' लोगो की आस्था का केन्द्र रहा है | कहते है कि आधुनिक '' कोलकाता '' का मध्य एवं उत्तरकाल में नाम '' कलिका -- स्थान '' -- '' कलिकाथा '' कलिकाता बनता -- बिगड़ता रहा है जो काली माँ के आधार पर अवस्थित है | स्वास्थ्य , संगीत , कला मंच , व्यापार के माध्यम से बगाली बन्धुओ ने इसे न केवल उत्तर प्रदेश, बिहार बल्कि देश के सुदूर प्रान्तों और अंचलो तक ले गये | बंग विभाजन एवं बागलादेश के उदय ने भी बगाल मूल के लोगो का पूरे बड़े फलक पर वितरण किया | फलत: बंग - बन्धुओ के साथ '' दुर्गापूजा '' भी समूचे विश्व में प्रतिष्ठित हुआ | बंगाल में देवी पूजन परम्परा का मूल 19 वी शताब्दी में प्राप्त होता है | जब विधर्मियो के आक्रमण से धार्मिक आन्दोलन का समय था | बालकवि दीपक एक स्मृतिकार थे उन्होंने संस्कृत श्लोकों एवं बंगभाषी पद्दति में दुर्गापूजा का विधान बनाया | इसे अन्य स्मृतिकारो ने सुधारा | व्यवस्थित सुधार रघुनन्दन भट्टाचार्य ने 1757 ई में एक भव्य आयोजन के साथ किया | इसी वर्ष प्लासी युद्ध के पश्चात श्याम -- बाजार के राजवंशी राजा नवकृष्ण बहादुर ने दुर्गापूजा का भव्य आयोजन किया और लार्ड क्लाइव को आमंत्रित किया | इसी बीच 11 वी शताब्दी में लिपिबद्ध , दुर्गाचरण पद्धति को वाचस्पति मिश्र ने विस्तार से लिखा और दस प्रहरणी ( दस अस्त्रों से प्रहार करने वाली ) देवी का रूपायन किया तो सर्व प्रथम ताहिरपुर के महाराज वंश नारायण ने साढ़े आठ लाख रुपया खर्च कर 1783 में उत्तर भारत में दुर्गापूजा का भव्य आयोजन किया था | उत्तर भारत में बंगीय दुर्गापूजा की शुरुआत 1773 ई में काशी में आनन्द मोहन मित्रा के द्वारा किया गया | इसके ठीक तीन वर्ष बाद गोरखपुर की दुर्गाबाड़ी में वैसा ही भव्य आयोजन की शुरुआत हुई | दिल्ली में सार्वजनिक पूजा 1910 में शुरू की गयी -- धीरे --धीरे इसी क्रम में प्रयाग , लखनऊ , कानपुर आदि बड़े महानगरो से होते हुए यह सिलसिला 1956 में आजमगढ़ पहुचा | 1956 में यहाँ तैनात कुछ बंग बन्धुओ जो अधिकारी व डाक्टर और अन्य पेशो से जुड़े लोग थे उन्होंने तय किया कि यहाँ भी दुर्गापूजा होना चाहिए | इसी कर्म में श्री श्याम लाल अग्रवाल के स्टैन्डर्ड मेडिकल हाल के उपर बने मकान में उपस्थित हुए गणमान्य बंग बन्धु और शहर के सम्भ्रांत लोगो ने मिलकर बंग सोसायटी की नीव रखी | उस नीव रखने में डा नवजीवन बनर्जी , राजेन्द्र नाथ दत्ता ( रेलवे स्टेशन मास्टर ) डा एस के मुखर्जी ( तत्कालीन हेल्थ अफसर ) आजमगढ़ ई बी दास ( तत्कालीन एस डी ओ हाइडिल ) डा पी के अग्रवाल ( एम् ओ सीतापुर आँख का अस्पताल ) डा एस के साहा डा चित्तपद विश्वास , डा एस के सेन डा श्रीमोन्तो सिन्हा श्यामलाल अग्रवाल , के साथ विद्युत् -- विभाग से जुड़े श्री हिरण्य सेन गुप्ता , श्री बी मुखर्जी , विशटूपद दास , श्री निशिकांत राय , डी के दता और प्रख्यात इतिहासकार डा शांति स्वरूप वर्मा व एडवोकेट भगाव स्वरूप वर्मा ने इस बंग सोसायटी के माध्यम से आजमगढ़ को एक ऐसा मंच दिया जो आजमगढ़ को एक संस्कृति और परम्परा प्रदान करती है | 1956 सर्व प्रथम '' आदि शक्ति '' का पूजा का केन्द्र बना हाइडिल का कैम्पस | माँ आदि शक्ति का आव्ह्वान षष्टी के दिन विधिवत संस्कारों से पूरा क्या गया और सप्तमी के दिन इन परिवारों से जुड़े लोगो ने एक नये युग का सूत्रपात शास्त्रीय संगीत , कत्थक नृत्य , उप शास्त्रीय संगीत के माध्यम से महा अष्टमी के दिन बंग सोसायटी के शानदार मंचीय अभिनय कलाकारों ने पहला नाट्य मंचन '' शाहजँहा '' से किया | इसमें शाहजहाँ का मुख्य किरदार निभाया मिस्टर वी के दत्ता और अन्य किरदारों में डा एस के साहा , डा पी के अग्रवाल एन के राय बी मुखर्जी हिरण्य सेन गुप्ता शिशिर विश्वास ने इसका निर्देशन डा एस के साहा ने किया था | नवमी के दिन हिन्दी नाटक का मंचन हुआ पता करने के बाद भी उस नाटक का नाम नही मालुम हो सका | 1957 में बंग सोसायटी का दूसरा पड़ाव बना नर्सरी स्कूल का प्रागण -- 1957 में तत्कालीन जिलाधिकारी कृपा नारायण श्रीवास्तव आई ए एस द्वारा कलाभवन में जिले के बाढ़ पीडितो के आश्रय के लिए निर्माण कराया इस कलाभवन के साथ कुछ विशेषताए भी जुडी है इस कलाभवन के रंगमंच को प्रख्यात सिने कलाकार पृथ्वीराज कपूर ने डिजाइन दिया था और इसके पुस्तकालय में महा पंडित राहुल साकृत्यायन ने बौद्ध काल की मुर्तिया और प्राचीन काल की अमूल्य पांडुलिपिया सौपी थी जो आज नदारत है अगर वो पांडुलिपिया होती तो आजमगढ़ पर शोध करने वाले लोगो के काम आती | इसके साथ ही एक रंग आन्दोलन की शुरुआत भी कृपा नारायण जी ने किया इस कला भवन में पुस्तकालय के साथ ही अपनी पत्नी कुसुम जी के नाम से एक संगीत विद्यालय की स्थापना की | इस संगीत विद्यालय में 1959 में मिस्टर जैन जो एक शानदार कत्थक नर्तक थे उन्होंने इस जनपद को अपना अमूल्य योगदान दिया और यहाँ उन्होंने कत्थक नृत्य की शिक्षा शुरू की | कलाभवन के निर्माण के बाद से ही बंग सोसायटी का आदि शक्ति ( दुर्गापूजा ) का आयोजन इस प्रागण में होता चला आ रहा है | इसी दौरान आजमगढ़ बंग सोसायटी को 1964 में एक बेहतरीन कलाकार मिला '' गरीब फार्मिसी '' के संचालक डा रामपद चक्रवर्ती जी वो मात्र यहाँ तीन वर्ष ही रहे उनके बाद उनके भांजे डा गोराचांद बनर्जी ने बंग सोसायटी के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बागडोर संभाली डा गोराचांद बनर्जी ने बंग सोसायटी के मंच को एक ऊंचाई प्रदान की अपने बेजोड़ निर्देशकीय क्षमता से बंगला भाष्य के नाटको के साथ हिन्दी नाटको का और बंगाल की जात्रा का सफल निर्देशन किया इसके साथ ही उन नाटको में नूतन प्रयोग भी किये | इसी वर्ष इस मंच को जिले के रंग -- क्षेत्र में दो होनहार नगीने मिले | श्री दीनदयाल सिंह जो पी डब्लू डी में जूनियर इंजिनियर थे और शमशुल हुदा खान जो बाद के दिनों में '' डैडी " के नाम से मशहूर हुए | 70 के दशक में बंग सोसायटी को उस समय की नई पीढ़ी ने गति के साथ नई ऊर्जा प्रदान की डा पवित्र जीवन बनर्जी , डा जमाल , बृज मोहन , श्रीमती मंजू दत्ता , नमिता दता , सविता दता ,मीना दता ,श्रीमती मीना साहा ,श्रीमती स्वरूप इन सारे लोगो ने अपने मंचीय अभिनय से इस बंग सोसायटी के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को नई उर्जा प्रदान की उसी दशक में बंग सोसायटी में और निखार आया अब इसमें अपनी सक्रियता को इन लोगो ने बढाया डा दीपक साहा , अचिन कुमार दता डा सुभाष सिन्हा , प्रेम मजुमदार ,धिरेश्वर चटर्जी , गोपेश्वर बनर्जी डा तपन कुमार विश्वास आर बी भट्टाचार्य , नरेन भट्टाचार्य चंडी जीवन बनर्जी मधुलिका साहा , मधुछ्न्दा साहा , शिखा साहा , सुनीता सिन्हा श्रीमती जयश्री साहा ने बंग सोसायटी के मंच को नई दिशा प्रदान की 80 के दशक में इसमें जुड़े सुनील कुमार दत्ता , डा सौमित्र जीवन बनर्जी , उत्पल कुमार दत्ता , सुधीर कुमार दत्ता अधीर कुमार दत्ता , उत्तम दत्ता , रुद्राणी दत्ता , रीना दत्ता , पीयूष चक्रवर्ती बंग सोसायटी में 80 के दशक में बंग सोसायटी के रंगमंच पर नये प्रयोग की शुरुआत हुई सुनील दत्ता ने बादल सरकार के नूतन प्रयोग थर्ड थियेटर और शाशंक बहुगुणा के मनोशारीरिक थियेटर की समावेश करते हुए नाटको में नये प्रयोग किये बाबू देर डाल कुकुर , सेम साईट , डकैत कौन , विशुरेर बीये , मिस्टर जासूस , आमी मोदोंन बोलछी, पिनकुशन , काफी हाउस में इन्तजार , जनता पागल हो गई, हमे हमारा अधिकार दो के साथ ही दर्जनों नाटको का निर्देशन किया इसके साथ ही अभिनय भी किया | 90 के दशक में पीयूष चक्रवर्ती और सुमित दास ने लाईट साउंड का नया प्रयोग किया इसमें प्रकृति के संरक्षण को '' उपकारी वृक्ष और निरकुश मानव , लाल कमल नील कमल , महिषासुर मर्दनी संगीत की खोज में लाईट और साउंड की बेजोड़ प्रयोग करके उसके साथ ही बंग परिवार के बच्चो को भी मंचीय कलाकार बनाया कुमारी लिपि दत्ता , प्रकृति दता , श्रुति दत्ता , डोली मजुमदार , नन्दनी दास , मिष्टी दास , रेशम दास , बोनी दास ,शुभांकर दत्ता , समीर दत्ता , समरेश दत्ता , सुष्मिता दत्ता जैसे बाल कलाकारों ने अपने गीत संगीत नृत्य और अपने अभिनय से इस बंग सोसायटी के रंग मंच को नई दिशा देने का काम किया और आज भी बंग सोसायटी अपनी उसी पुरातन आदि शक्ति ( दुर्गा पूजा ) के परम्पराओं का निर्वहन करती चली आ रही है |
सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

भगत सिंह का दर्शन

भगत सिंह और उनके साथियों का सन 1920 में अंग्रेज साम्राज्यवादियो सत्ता के विरुद्ध मोर्चा लेना , भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव ही एक गौरवशाली अध्याय बना रहेगा | एक उच्च आदर्श के लिए अडिग निष्ठा और उस आदर्श को पूरा करने की राह में आई मुसीबतों की कहानी , देश वासियों को सदैव विदेशी आधिपत्य या जनता के किसी भी प्रकार के आर्थिक बंधन का नामो -- निशाँ तक मिटा देने के लिए संघर्ष को प्रेरित करती रहेगी |
भगत सिंह उनके बालपन में जनता के संघर्ष जनता का गुसा '' रौलेक्ट एक्ट '' के खिलाफ था , जिसके द्वारा अंग्रेज सरकार ने यह कोशिश की थी कि प्रथम विश्व युद्ध के समय की असाधारण दमनकारी धाराओं को युद्ध के बाद भी जारी रखा जाए | सारे देश में उथल पुथल थी , प्रदर्शन हो रहे थे , जगह - जगह हडतालो की बाढ़ आ गयी थी | बम्बई की हडतालो में सूती मिलो के एक लाख से भी ज्यादा मजदूर काम छोड़कर सडको पर आ गये थे | सरकार जनता पर भीषण दमन का चक्र चला रही थी | अप्रैल 1919 में अमृतसर के जलियावाला बाग़ में जनरल डायर ने सभा में एकत्र हुए जन समूह पर गोलिया बरसाकर निहत्थे आदमियों , औरतो तथा बच्चो का कत्ल कर दिया , पर आन्दोलन रुका नही चलता रहा | कांग्रेसी वालन्टियर के रूप में भगत सिंह का जन्म लाहौर से कुछ मील दूर सिन्दा गाँव में किसानी करने वाले एक सिख परिवार में हुआ था | उनके पिता -- सरदार किशन सिंह आर्य समाज के समाज सुधार आन्दोलन में शामिल होने के कारण प्रसिद्ध थे | भगत सिंह ने अपने स्कूली जीवन में ''रौलेक्ट एक्ट '' के खिलाफ होने वाले जनता के प्रदर्शनों के उथल पुथल भरे दिन देखे थे | अग्रेजी शासन के खिलाफ आम जनता की घृणा ने -- जो अपने -- आप फूट पड़ी थी और जिसका इजहार लाहौर में तीन मील लम्बे जलूस तथा उसके बाद होने वाली सप्ताह भर की शानदार हड़ताल में हुआ था -- स्वाभाविक तौर पर इस बारह वर्ष के बालक के दिमाग पर एक गहरा असर डाला था | उसके कोमल मस्तिष्क पर अपनी गहरी छाप छोड़ी थी | दो वर्ष बाद भगत सिंह ने असहयोग -- आन्दोलन में एक कांग्रेसी वालंटियर की हैसियत से अपनी सक्रिय राजनैतिक शिक्षार्थी -- जीवन की शुरुआत की | उन्होंने सिख गुरुद्वारे के प्रचार -- आन्दोलन में भी सक्रिय भाग लिया | यह आन्दोलन गुरुद्वारे की विशाल भूमि की सम्पत्ति पर थोड़े से महन्तों का ही सम्पत्ति -- अधिकार बनाये रखने के विरुद्ध , और उसे सारे सिख समुदाय की पंचायत के अधिकार में लाने के लिए था | सत्याग्रह सफल हुआ | पर उसके बाद , सिखों के एक हिस्से में साम्प्रदायिकता बढने लगी , परन्तु भगत सिंह साम्प्रदायिकता से दूर रहे उन्होंने उसमे सहयोग नही दिया | इतनी कुछ सक्रियता के बाद भगत सिंह ने पंजाब नेशनल कालेज में नाम लिखाया , तब वह अपने संक्षिप्त पर सितारे की तरह झिलमिलाते हुए क्रांतिकारी जीवन के द्वार पर ही थे | यही पर वह सुखदेव और उन दूसरे साथियों से मिले जो आगे चलकर क्रांतिकारी कार्य में उनके साथी बने | इसी दौरान में उत्तर परदेश के क्रान्तिकारियो द्वारा संगठित '' हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी '' से सम्पर्क किया '' हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियसन '' सितम्बर सन 1928 में इन क्रान्तिकारियो का काम एक महत्वपूर्ण मंजिल तक पहुच गया था जब मुख्यत: भगत सिंह , सुखदेव , विजय कुमार सिन्हा और शिव वर्मा के प्रयत्नों से उत्तर प्रदेश, पंजाब , राजपुताना , और बिहार के क्रांतिकारी दलों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में फिरोजशाह कोटला के पास कांफ्रेंस की | दो दिन की बहस के बाद एक नया संगठन बनाया गया जिसका नाम '' दि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया | उसकी केन्द्रीय समिति भी चुनी गयी और सभी प्रान्तों से सम्पर्क रखने का कम विजय कुमार सिन्हा और भगत सिंह को सौपा गया इस कांफ्रेंस में समाजवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना के उद्देश्य का स्वीकृत होना बताता है कि रुसी क्रांति के फलस्वरूप भारत के अधिकाधिक तरुणों में समाजवादी विचारों का प्रसार होता जा रहा था | भगत सिंह कुछ समय के लिए '' कृति '' के दफ्तर से भी काम कर चुके थे | इस समाजवादी पत्र को पंजाब के कम्युनिस्ट नेता सरदार सोहन सिंह '' जोश '' ने शुरू किया था | भारत के साम्राज्यवाद ---- विरोधी संघर्ष में मार्क्सवाद -- लेलिनवाद के अस्त्र को काम में लाने का पूरा अर्थ तो इन क्रान्तिकारियो ने भी अभी तक नही समझा था लेकिन उनमे इस विश्वास ने जड़ जमा ली थी कि मनुष्य द्वारा होने वाले मनुष्य के शोषण को सिर्फ समाजवाद ही खत्म कर सकता है | उनके इरादे क्या भगत सिंह और उनके साथी गोरी चमड़ी वाले अफसरों के खिलाफ थे जो अन्याय करते थे | साण्डर्स को गोली मारने के बाद बाटे हुए उनके पर्चे को देखने पर , कोई भी उन पर ऐसा लाक्षण नही लगा सकता था | असेम्बली भवन में बाटे हुए उनके पर्चे भी यही बताते है | उन पर्चो से मनुष्यों के रक्तपात के प्रति उनकी दिली नफरत और न्याय के लिए उनकी ललक की भी झलक मिलती है | अंग्रेज शासन का हित इसी में था कि जनता के सामने भगत सिंह के कार्यो को दूसरे ही रंगों में पेश किया जाए नही तो उनकी अमानुषिक दण्ड देने पर सारे देश की संवेदना और क्रोध का ज्वार उमड़ पड़ता | इसीलिए उस परचे पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | हिन्दुस्तान टाइम्स के एक उत्साही सवाददाता ने किसी तरह विस्फोट के ठीक बाद ही उस परचे की एक प्रति हासिल कर ली और उसी दिन दोपहर को अखबार का एक विशेष संस्करण निकला जिसने उसके विषय की जानकारी को जनता की सम्पत्ति बना दिया | परचा इस प्रकार था -----'' बधिरों को सुनाने के लिए एक भारी आवाज की आवश्यकता पड़ती है | ऐसे ही एक अवसर पर , एक फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद -- भाईयो -- द्वारा कहे गये इन अमर शब्दों के साथ '' हम दृढतापूर्वक अपने इस कार्य को न्यायपूर्ण ठहराते है | '' '' हम यहाँ सुधारों ( माटेग्यु - चेम्सफोर्ड सुधारों ) के लागू होने के पिछले दस वर्षो के अपमानजनक इतिहास की कहानी को बिना दोहराए और भारत के माथे पर इस सदन -- इस तथा कथित भारतीय प्रालियामेंट द्वारा मढ़े हुए अपमानो का भी बिना कोई जिक्र किये देख रहे है कि इस बार फिर , जबकि साइमन कमीशन से कुछ और सुधारों की आशा करने वाले लोग उन टुकडो के बटवारे के लिए ही एक दूसरे पर भौक रहे है ,, सरकार हमारे उपर पब्लिक सेफ्टी ( जन सुरक्षा ) और ट्रेडर्स डिस्प्यूट्स ( औद्योगिक विवाद ) जैसे दमनकारी बिलों ( विध्येको ) को थोप रही है | ' प्रेस सेडीशन बिल ' को उसने अगली बैठक के लिए रख छोड़ा है | खुले आम काम करने वाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारिया साफ़ बताती है कि हवा का रुख किस तरफ है | इस अत्यंत ही उतेजनापूर्ण परिस्थितियों में पूरी स्जिदगी के साथ अपनी पूरी जिम्मेदारी महसूस करते हुए , ( हि. सो , रि ए ) ने अपनी सेना को यह विशेष कार्य करने का आदेश दिया है जिससे कि इस अपमानजनक नाटक पर परदा गिराया जा सके | विदेशी नौकरशाह शोषक मनमानी कर ले | लेकिन जनता की आँखों के सामने उनका असली रूप प्रकट होना चाहिए | जनता के प्रतिनिधि अपने चुनाव -- क्षेत्रो में वापिस लौट जाए और जनता को आगामी क्रान्ति के लिए तैयार करे | और सरकार भी यह समझ ले कि असहाय भारतीय जनता की ओर से ' पब्लिक सेफ्टी ' और ट्रेडर्स डिस्प्यूटस ' बिलों तथा लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या का विरोध करते हुए हम उस पाठ पर जोर देना चाहते है जो इतिहास अक्सर दोहराया करता है | यह स्वीकार करते हुए दुःख होता है कि हमे भी जो मनुष्य को जीवन को इतना पवित्र मानते है , जो एक ऐसे वैभवशाली भविष्य का सपना देखते है जब मनुष्य परम शान्ति और पूर्ण स्वतंत्रता भोगेगा , मनुष्य का रक्त बहाने पर विवश होना पड़ा है | लेकिन मनुष्य द्वारा होने वाले मनुष्य के शोषण को असम्भव बनाकर सभी के लिए स्वतंत्रता लाने वाली महान क्रान्ति की वेदी पर कुछ व्यक्तियों का बलिदान अवश्यभावी है | इन्कलाब जिंदाबाद हस्ताक्षर बलराज ( कमांडर इन चीफ ) भगत सिंह का दर्शन -- के क्रांति और बमो के संदर्भ में भगत सिंह क्रान्ति को किस रूप में समझते थे ? दिल्ली सेशन जज द्वारा आजन्म कैद की सजा के फैसले के खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट में अपनी अपील की सुनवाई के समय उन्होंने अदालत में कहा था : -- '' क्रान्ति संसार का नियम है , वह मानवीय प्रगति का रहस्य है | लेकिन '' उनमे रक्तरंजित संघर्ष बिलकुल लाजिमी नही है और न उसमे व्यक्तिगत प्रति -- हिंसा की ही कोई जगह है | वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नही है | लेकिन तब भगत सिंह और उनकी पार्टी द्वारा संगठित साण्डर्स गोलीकांड और तमाम बमो के विस्फोटो का क्या अर्थ लगाया जाना चाहिए ? साण्डर्स से असेम्बली के बम फोड़ने के बाद बाटे गये परचे इन कृत्यों के कारणों को बताते है | दिल्ली लाहौर की अदालतों में दिए गये भगत सिंह के वक्तव्य में उन्हें विस्तृत रूप से रखा गया था | उन्होंने बिलकुल स्पष्ट तौर पर कहा था वह और उनके साथी विदेशी शासन के कसमसिया दुश्मन होते हुए भी किसी व्यक्ति के प्रति अंधी और कुत्सित घृणा की भावना से प्रेरित नही थे | बटुकेश्वर दत्त के साथ , एक संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषित किया था :: '' हम मानवीय जीवन को अकथनीय पवित्रता देते है | मानवता की सेवा किसी को हानि पहुचाने की अपेक्षा शीघ्र ही अपने स्वंय के जीवन को होम कर देगे | हम समाजवादी सेना के भाड़े के सैनिको के तरह नही है , जिन्हें बिना किसी अफ़सोस के हत्या करने का अनुशासन सिखाया जाता है | हम मानवीय जीवन का आदर करते है जहा तक बनता है उसे बचाने के कोशिश करते है | इस पर भी , हम असेम्बली भवन में जानबूझकर बम फेकने के काम को स्वीकार करते है | तथ्य स्वंय ही अपनी कहानी कहते है और उद्देश्यों की परख उस काम प्रणाम को देखकर ही करनी चाहिए , न कि कल्पित परिस्थितियों और मनमानी धारणाओं के आधार पर | '' सरकारी पक्ष के विशेषज्ञ के सबूतों के बावजूद , असेम्बली भवन में फेके जाने वाले बमो से आधे दर्जन से भी कम लोगो को कुछ खरोचे भर लगी यदि उन बमो में कुछ ज्यादा क्लोरेट पोटाश का पूत दे दिया जाता और जेल किस्म की पिक्रेट ( एसिड ) का भी मिश्रण होता , तो उनसे चारो ओर का टीम -- ताम ही चकनाचूर हो जाता और विस्फोट के कुछ गजो के दायरे में तमाम लोग धाराशायी हो जाते | यदि , उन बमो में कुछ दूसरे अधिक विस्फोटक प्रदार्थ व नाशकारी चहरे या सुइया आदि भी मिला दी जाती तो वह विधान सभा के अधिकांश सदस्यों को खत्म करने के लिए काफी होते | इस पर भी हम उन्हें अफसरों के बैठने के स्थान पर फेंक सकते थे जहा बहुत ख़ास -- ख़ास लोग ठसाठस भरे थे | और अंत में हम उन बमो का निशाना सर जान साइमन को भी बना सकते थे जो उस समय अध्यक्ष की गैलरी में बैठा था , जिसके अभागे कमिशन से सभी जिम्मेदार आदमी नफरत करते थे | लेकिन यह सब कुछ तो हमारा उद्देश्य नही था | बमो ने ठीक उतना ही काम किया जितने के लिए वे बनाये गये थे | जिसे चमत्कार कहा जाता है वह कुछ और नही , एक समझा बुझा हुआ उद्देश्य ही था , जिसके कारण वे हानिरहित स्थानों पर ही फेंके गये थे | '' अपने मुकदमे में बहस करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि विठ्ठल भाई पटेल , पंडित मोतोलाल नेहरु , पंडित मदन मोहन मालवीय तथा दूसरे आदरणीय नेताओ पर संहारक बम फेकने की बात वे सपने में भी नही सोच सकते थे -- यह अलग बात थी कि क्रांतिकारी उन नेताओं के विचारो से सहमत नही थे | उनके साधनों में विश्वास नही करते थे | भगत सिंह ने मिस्टर जसिस्ट फोर्ड से पूछा था : '' यदि एक आदमी इस तरकीब से एक बम बनाता है कि उससे किसी को भी कोई गम्भीर चोट नही लग सकती और वह उसके फटने के वक्त ज्यादा से ज्यादा सावधानी बरतता है कि कोई ऐसी चोट न लग सके , तब भी क्या वह आदमी हत्या का पर्यटन करने का अपराधी होगा ? मिस्टर फोर्ड : '' तुमको यह साबित करना होगा कि वह बम इसी प्रकार का था , और उसको ऐसे ढंग से फेंका गया था कि किसी आदमी के जीवन को खतरा पैदा न हो | " भगत सिंह : '' हम उन बमो की सीमित शक्ति जानते थे , और किसी को भी चोट न लगने देने के लिए हमने हर संभव सावधानी बरती थी | '' उन्होंने आगे कहा कि जनरल दायर ने जालियावाला बाग़ में सैकड़ो आदमियों की हत्या की थी , लेकिन उस पर कभी भी मुकदमा नही चलाया गया था | इसके विपरीत उसके देश के लोगो ने उसे लाखो का इनाम दिया था | वह कहते गये उसकी तुलना में '' हम एक कमजोर बम बनाते है और जानबूझकर उसे एक खाली स्थान पर फेंकते है | पर हम , पर मुकदमा चलाया जाता है और आजन्म कैद की सजा सुनाई जाती है | किसी की हत्या करने का हमारा इरादा नही था | द्देष शब्द को निकल दीजिये बस मुझे संतोष हो जाएगा | हमारा एक निश्चित आदर्श है हम अपने आदर्श को पाने के लिए कुछ साधन अपनाए थे | '' भगत सिंह को ऐसा कोई बचकाना भ्रम नही था कि बमो से ही क्रान्ति आ जायेगी | या ऐसा करना क्रान्ति की ओर एक आगे बढा हुआ कदम होगा | परतंत्र मातृभूमि की वेदना ने उनके हृदय में विद्रोह की भावना जगा दी | बमो का प्रयोग देशवासियों की हृदय -- विदारक पीड़ा के प्रति उनके '' क्षोभ का अभिव्यक्तिकरण ही था |
दिल्ली के अदालत में उन्होंने कहा था '' समाज का वास्तविक पोषक मजदूर है | जनता का प्रभुत्व मजदूरो का अंतिम भाग्य है | इन आदर्शो और विश्वासों के लिए , हम हर उस कष्ट का स्वागत करेंगे जिसकी हमे सजा दी जायेगी | हम अपनी तरुणाई को इसी क्रान्ति की वेदी पर होम करने लाये है क्योकि इतने गौरवशाली उद्देश्य के लिए कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नही है | क्रान्ति के आगमन की प्रतीक्षा करने में हमे संतोष है '' | उनके विचार से क्रान्ति का उद्देश्य '' स्पष्ट रूप से अन्याय पर खड़ी हुई वर्तमान व्यवस्था '' को बदलना था | यह अन्याय किस जगह पर होता है ? '' समाज के सबसे आवश्यक तत्व होते हुए भी उत्पादन करने वालो या मजदूरो से उनके शोषक उनकी मेहनत का फल लूट लेते है , और उनको प्रारम्भिक अधिकारों से भी वंचित कर देते है | एक ओर तो सभी के लिए अनाज पैदा करने वाले किसानो के परिवार भूखो मरते है सारे संसार के बाजारों को सूत जुटाने वाला जुलाहा अपना और अपने बच्चो का तन ढकने के लिए भी पूरा कपडा नही जूता पता शानदार महल खड़े करने वाले राज लुहार और बढ़ई झोपड़ियो में ही बसर करते और मर जाते है और दूसरी ओर पूजीपति शोषक -- समाज की जोंके -- अपनी संको पर ही करोड़ो बहा देते है | '' भगत सिंह ने कहा था कि इसीलिए एक उग्र परिवर्तन की आवश्यकता थी और लोग भी महसूस कर चुके थे उनका कर्तव्य था कि '' एक समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन करे | '' '' जब तक यह नही किया जता और मनुष्य द्वारा होने वेक मनुष्य के , तथा साम्राज्यवाद का चोगा पहने हुए देश द्वारा देश के शोषण का अंत नही किया जता , मानवता की इस मुसीबत और खूनखराबे को , जो आज उसे धमका रही है , नही रोका जा सकता | दरअसल इसके बिना युद्धों को अंत करने और विश्व व्यापी शान्ति के युग को लाने की सारी बाते ऐसी व्यवस्था की स्थापना जिसमे इस प्रकार के हडकम्प का भय न हो और जिसमे मजदुर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूजीवाद के बन्धनों , दुखो तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्धार कर सके | '' आज भी भगत सिंह के विचार प्रासंगिक है |
-सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

महाजनी कर्जदारी के मकड़जाल का सरकारी स्वरूप, किसानो के लिए कर्ज़ का बदलता स्वरूप

( यह सरकारों द्वारा पहले के जनहित में कर्ज़ और फिर बाद में सरकारी महाजनी कर्ज़ और अब सरकारों द्वारा अनुमोदित प्राइवेट माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों द्वारा किये जा रहे कर्ज़ के रूप में बदलाव )
1950 में किसानो एवं अन्य ग्रामवासियों के लिए कर्ज़ का मुख्य स्रोत निजी महाजन ही था | हालाकि कोआपरेटिव सोसायटी की शुरुवात ब्रिटिश शासनकाल में ही हो गयी थी , पर उनकी पहुंच बहुत कम थी | 1950 में भी सरकारी या सरकार द्वारा संचालित कोआपरेटिव संस्थाओं के जरिये कृषि क्षेत्र के लिए आवश्यक कर्ज़ मात्र तीन प्रतिशत ही मिल पाता था | 97% कर्ज़ महाजनों से ही मिलता था | बताने की जरूरत नही की महाजनों के दिये कर्ज़ पर न केवल व्याज दर ज्यादा थी , बल्कि उसको वसूलने का तरीका भी निहायत जालिमाना था | उसमे आज भी बहुत अन्तर नही आया है | लेकिन आज महाजनी के कर्ज़ों की जगह सरकारी कर्जे प्रमुख हो गये है | सरकारी कर्जो के बढाने की वजह किसानो को सहायता देने के साथ - साथ उन्हें महाजनी कर्जो के जाल से मुक्त करना भी बताया जाता रहा है | इसकी शुरुआत 1950 के बाद कोआपरेटिव सोसाइटी के विस्तार से किया गया | 1950 - 55 तक कोआपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीयो द्वारा दिये गये कर्ज़ की कुल रकम 23 करोड़ थी | इसे 1960 - 61 में बढाकर 200 करोड़ तथा 2000-01 में बढाकर 34520 करोड़ रुपया कर दिया गया | इसमें कोई दो राय नही थी कि कोआपरेटिव सोसाइटीयो के जरिये लघु एवं सीमांत किसानो को कर्ज़ मिलने में भारी सहूलियत हुई | महाजनों की धकड़ -पकड कमजोर पड़ी | 2010 तक कोआपरेटिव सोसाइटीयो का व्याज दर 6% निर्धारित था | साल भर तक कर्ज़ न चुका पाने पर 7% की व्याज दर और दो साल बाद 10% की व्याज दर निर्धारित कर दिया है | साल भर बाद कर्ज़ वापस न करने पर 6% का व्याज दर निर्धारित किया गया है | एक तरफ सरकार सोसायटी कर्ज़ पर व्याज दर घटा रही है | दूसरी तरफ बहुतेरी कोआपरेटिव सोसाइटी बंद हो चुकी है | कोआपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीयो को कम करने की शरुआत 1970 -71 से कर दी गयी थी | उदाहरणार्थ 1960 - 61 में इन सोसाइटीयो की कुल संख्या दो लाख बारह हजार थी , जो 1970 - 71 में घटकर एक लाख इकसठ हजार रह गयी |मार्च 2006 तक इनकी संख्या एक लाख छ हजार हो गयी | इसका कारण वैसे तो कोआपरेटिव सोसाइटीयो में व्याप्त भ्रष्टाचार और उनकी दिवालिया होती स्थिति को बताया जाता है |यह भी एक कारण है | पर असली कारण यह है कि 1969 में बैंको के राष्ट्रीयकरण और उनकी शाखाओं व ग्रामीण बैंको के बढ़ते फैलाव के बाद सरकारों ने कोआपरेटिव सोसाइटीयो को भ्रष्ट व दिवालिया होने भी दिया |उन पर अंकुश लगाने और बेहतर बनाने की जगह उन्हें भ्रष्ट व बद्दतर होकर बंद होने के लिए छोड़ दिया | यह काम इसलिए भी किया गया ताकि किसान अब सोसायटियो को छोड़ कर बैंको से कर्ज़ लें | लेकिन इन बैंको से कर्ज़ पाना हर छोटे व सीमान्त किसानो के लिए कोआपरेटिव सोसायटी से कर्ज़ ले पाने जैसा आसान नही था | ग्रामीण अंचलो के बैंको की बढती शाखाओं के वावजूद छोटी स्थिति के लोगो द्वारा कर्ज़ ले पाना आज भी आसान नही है ,हालाकि सरकारे इन्ही कर्जो का विस्तार करती रही है | वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में किसानो की कर्ज़ सहायता और प्राइवेट महाजनी से मुक्ति के नाम पर इनका विस्तार 'स्पेशल क्रेडिट प्लान ' के तहत किया जाता रहा | इसकी शुरुआत 1994 - 95 के वित्तीय वर्ष में 8225 करोड़ के निर्धारण से शुरू किया गया | वर्ष 2003 - 04 में इसे बढाकर 44 हजार करोड़ रुपया कर दिया गया और 2006 - 07 यह रकम तेज़ी से बढाकर 2 लाख 57 हजार करोड़ कर दी गयी | चालू वित्त वर्ष 2011 - 12 के लिए इसे 3 लाख 75 हजार करोड़ निर्धारित किया गया है | यह कोआपरेटिव सोसायटियो को उपेक्षित करके बैंको को बढ़ावा देना मात्र नही है | बल्कि , दरअसल यह आम ग्रामीणों की पहुच की कर्ज़दात्री संस्थाओं को उनकी पहुंच से बाहर कर देना है | इसके आकलन व आकंडे आते रहते है कि 50 % ग्रामीणों , खासकर छोटे व सीमान्त किसानो का बड़ा हिस्सा बैंको का कर्जदार नही है | इसलिए नही की उसे कर्ज़ की जरूरत नही है , बल्कि वह कर्जदार इसलिए नही है कि उसकी बेंको तक पहुंच नही है या बहुत कम है | बढ़ते कृषि कर्ज़ की रकमों के संदर्भ में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि किसानो के लिए सरकारी कर्ज़ को बढावा देने का काम 1960 के दशक से शुरू हुई आधुनिक बीज -खाद की खेती के साथ किया जाता रहा | क्योंकि अब किसानो को बीज खाद व अन्य कृषिगत लागत के सामानों संसाधनों को खरीदने के लिए नकद पैसो की जरूरत हुई | यह काम सोसायटियो व बैंको के जरीए बढाया गया | प्राइवेट महाजनी कम होती जा रही थी लेकिन अभी भी ज्यादा ही थी | इसके वावजूद 70-80 के दशक में किसानो के कर्जो में बुरी तरह फसने और फसकर आत्महत्या करने की खबर आमतौर पर सुनाई पड़ती थी | क्योंकि अभी भी खेती घाटे का सौदा नही थी | कृषि को मिलती सरकारी सहायताओ , अनुदानों आदि के चलते ही कृषि लागत अभी भी सस्ती थी | फलत: किसान कर्ज़ में फसा भी कम था और बहुत हद तक उसकी वापसी भी कर देता था | लेकिन 1991 से वैश्वीकरणवादी नीतियों तथा बाद के डंकल - प्रस्ताव के लागू होने के पश्चात सरकारी सहायताए , छूटे व अनुदान के घट जाने के फलस्वरूप कृषि लागत में भारी वृद्धि होती रही | कृषि उत्पादों की बिक्री को बाज़ार से पूरा कर पाना मुशिकल होता गया | फलत: किसान सरकारी व गैरसरकारी कर्जो को लेने और उसे वापस न कर पाने के दुश्चक्र में फसता गया | कर्जो में फंसे किसान आत्महत्या करने के लिए विवश होते गए | यह साफ़ बात है कि किसानो के बढ़ते संकट व आत्महत्याए मुख्यत: महाजनी कर्ज़ के चलते नही हुई है , जैसा कि प्रचार है | बल्कि वह खेती - किसानी के बढ़ते खर्च तथा सरकारी कर्ज़ के बदलते उद्देश्य के चलते हुई है | 1950 में शुरू किए सहकारी कर्ज़ का उद्देश्य मुख्यत: जनहित व किसान हित के कर्ज़ का था | अब वह सरकारी महाजनी के रूप में बदलता जा रहा है | यह बदलाव , किसानो की छूटो , सहायताओ को काटकर उन्हें कम या ज्यादा व्याज पर सरकारी व गैर सरकारी कर्जदारी में फसाते जाने का बदलाव है | इसका एक बड़ा सबूत हमारे सामने है | चूकि छोटे व सीमांत किसानो का खासा हिस्सा एवं ग्रामीणों मजदूरों एवं छोटे दस्तकारो का बहुसंख्यक हिस्सा अभी भी बांको में अपनी पहुंच नही रखता | इसलिए सरकारों ने माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों की सरकार द्वारा अनुमोदित संरचनाये खड़ी कर दी है | यह सरकार के संरक्षण में सरकारी बैंको के सहयोग से प्राइवेट महाजनी की वापसी है | उसकी स्थापना है | प्राइवेट महाजनों द्वारा लिए जाने वाले शुल्क की दर 24% है जबकि फाइनेन्स कम्पनियों की दर 26% है | सरकारी बैंको की व्याज दर 5% से 12% तक है | लेकिन उन्ही की पूंजीगत सहायता से चलाई जा रही माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों को 26% तक व्याज लेने की सरकारी छूट है | साफ़ बात है कि सरकारी बैंको से कर्ज़ लेने में सक्षम ग्रामीण समाज के थोड़ी बेहतर स्थिति वालो को कर्ज़ पर सरकारी सूद दर कम है , पर माइक्रोफाइनेंस के जाल में फसने वाले छोटे व निचले गरीब हिस्से के लिए यह कई गुना ज्यादा है | इसके बावजूद माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों को निचले लोगो के लिए वरदान स्वरूप प्रचारित किया जाता रहा है | यह सरकारों द्वारा पहले के जनहित में कर्ज़ और फिर बाद में सरकारी महाजनी कर्ज़ और अब सरकारों द्वारा अनुमोदित प्राइवेट माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों द्वारा किये जा रहे कर्ज़ के रूप में बदलाव है | कम व्याज के कर्जो से लेकर अधिक और अधिक व्याज वाले कर्जो के रूप में बदलाव | जीविकोपार्जन के सहयोगी कर्ज़ की जगह आत्महत्या के लिए मजबूर कर देने वाले कर्ज़ के रूप में बदलाव है | एक और ध्यान देने योग्य बात किसानो की आत्महत्याओं की आज जैसी घटनाए उस दौर में नही थी , जब किसान व अन्य ग्रामीणजन पूरी तरह महाजनी कर्जो पर निर्भर थे | लेकिन अब जबकि प्राइवेट महाजनी पहले से कही कम है और सरकारी महाजनी बढती जा रही है तो किसानो की आत्महत्याओं की संख्या भी तेज़ी से बढती जा रही है |साफ़ बात है कि किसानो कि आत्महत्याओं का मामला उस कृषि संकट से जुडा हुआ है , जिसमे घाटे में जाती रही खेती से कर्ज़ वापस करना मुश्किल दर मुश्किल होता जा रहा है | यह मुश्किल मात्र कर्ज़ की नही बल्कि खेती की सरकारी सहायता - अनुदानों के कटने के बाद बढती लागत की है |कृषि उत्पादों के कम , अनिश्चित डावाडोल स्थितियों की अधिक है |इन्ही के चलते सरकारी व गैर सरकारी कर्जो की अदायगी मुश्किल होती गयी है | क्या देश के लोग इन बातो पे ध्यान देंगे कि आखिर किसान आत्महत्या क्यों कर रहे है ?इन आत्महत्याओं को रोकने की कोई सार्थक पहल होगी क्या ?
सुनील दत्ता पत्रकार

सीदी मौला -----------------

आज के युग में ही नही मध्यकाल में भी आसाराम बापू टाइप जैसे साधू -- सन्यासी होते थे उन्ही में से एक सीदी मौला भी था |
सीदी मौला एक ऐसा चरित्र जो भारत के मध्यकाल में ठगी , चोरी और डकैती करके भी पूरे उत्तर भारत में अपने को संत कहलवाता था | ऐसे लोगो के कारण किसी भी धर्म या समाज की मान्यताये टूटकर बिखरती है | भारत का शायद ही कोई गाँव या शहर होगा जिस में किसी साधू , संत , पीर या फकीर ने अपना डेरा न जमा रखा हो , धन यश खाने के लिए तर -- माल , वासनापूर्ति के लिए युवती चेलिया तो मिलती ही है | उस पर मजे की बात यह है कि लोग '' महाराज जी ' '' गुरु जी '' कहते हुए पैरो में झुकते चले जाते है | साधू संत बनने के लिए किसी योग्यता की भी आवश्यकता नही , केवल सिर मुडाने , या जटा बढाने और भगवे कपडे रंगने के जरूरत है , ऐसे लाखो रंगे सियार मध्यकाल में भी थे और आज भी है | संभव है इन लाखो संत , फकीरों में दो चार सत्पुरुष विद्वान् भी हो , पर निश्चय ही ज्यादा भीड़ तो मुर्ख , नशेबाज , पाखण्डियो की ही होती है | मध्ययुग में तो इन का खूब प्रभाव था -- सुलतान और उसके आमिर तक इनका आदर करते थे , फिर जनसाधारण का तो कहना ही क्या ? कभी -- कभी ये धूर्त रंगे सियार ऐसे अपराध भी कर बैठते या रासलीला फैलाते की आम जनता लुटी सी बस देखती रह जाती | आये दिन ये पाखंडी लोग कोई ना कोई गुल जरुर खिलाते रहते थे सीदी मौला उसी जमाने का एक भारी मक्कार धूर्त और रंगा सियार था , जिसकी मान्यता उस समय सारे उत्तर भारत में फैली हुई थी | लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी | दिल्ली और उस के आसपास के इलाको में सीदी की ऋद्दी सिद्दि और चमत्कारों की बड़ी धूम थी , मौला उत्तर पश्चिमी सीमाप्रांत का निवासी था और सुलतान बलबन के समय दिल्ली में आ बसा था , उसने अपने लम्बे जीवन में बलबन और उस के उत्तराधिकारियों का शासन देखा था और अब खिलजी वंश के सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में भी उसकी प्रतिष्ठा पूर्ववत बनी हुई थी | गुलाम वंश के ध्वसावशेषो पर अब जलालुद्दीन ने खिलजी वंश की नीव रखी तो बलबनी दरबार के कितने आमिर , जागीरदार और सरदार बेघर -- बार हो गये थे | इस क्रान्ति की आंधी ने बड़े -- बड़े सुदृढ़ स्तम्भ गिरा दिए थे | पर इस सीदी मौला के वैभव में कोई अंतर नही आया था | सीदी मौला के वैभव और ऐश्वर्य का कोई अंत नही था | उसके निवास स्थान पर हर समय लोगो की भीड़ लगी रहती थी , भिन्न -भिन्न कामनाओं को लेकर लोग वह आते थे | आम लोगो का विश्वास था की इस महान संत की वाणी सिद्द है , वह अपने मुख से जो कुछ कह देता वह सत्य उतरता था |दुनिया भेड़ -- चाल पर चलती है , जल्दी ही सीदी मौला के चमत्कारों की कहानी चारो ओर फ़ैल गयी | लाखो लोग उस पर श्रद्दा रखते थे , एक बात तो प्रत्यक्ष थी | सीदी मौला हजारो रूपये खर्च कर के लोगो को खूब अच्छा खिलाता - पिलाता था | जल अथवा स्थल मार्ग से जो यात्री उसके खानगाह पर पहुच जाता वह बिना कुछ खर्च किये उत्तम भोजन प्राप्त करता था | उसके दस्तरखान पर नाना प्रकार के वे व्यंजन चुने जाते थे जो बड़े बड़े खान और अमीरों को भी सुलभ न थे | यह भी एक कारण था की उसके दरवाजे पर हर समय भीड़ लगी रहती थी | हर महीने हजारो मन मैदा 500 जानवरों का मांस 200 या 300 मन खांड 100 या 200 मन मिसरी खरीदी जाती थी | आटा , दाल , घी , सागभाजी , ईधन की कोई गिनती न थी | सीदी मौला का स्थान बेकार , आलसी , पेटू , निक्कमे और जाहिल लोगो का स्वर्ग बन गया था | दिन में दो -- दो बार उत्तम प्रदार्थ लोगो में बाटे जाते थे | लोगो को इस बात पर बड़ा आश्चर्य होता था की सीदी मौला के पास इतना धन कहा से आता है , रोज हजारो सिक्को का खर्च था , वह मुफ्त भोजन ही नही बाटता था बल्कि अमीर गरीब सभी को कभी -- कभी मौज में आकर शुद्द चांदी के सिक्के भी बाटता था | यहाँ सोने चांदी की कीमत ईट- पत्थरों से अधिक नही थी | किसी व्यापारी अथवा जरूरतमंद आदमी को उसका धन चुकाने का तरीका भी बहुत अजीब था | वह अक्सर उनसे कह देता था , '' जाओ , फला पत्थर या पेड़ के नीचे इतने रूपये दबे हुए है '' | सचमुच वह उन्हें उतने रूपये मिल जाते , इस तरह से उसकी ख्याति और ज्यादा फ़ैल जाती | सच्चाई यह थी की मौला या उस का कोई चेला वहा पहले ही धन दबा आता था , इस पर भी तुर्रा यह की उसने कभी किसी से कुछ स्वीकार नही किया | सुलतान के बड़े बड़े अमीर उसके सामने थैलिया लिए खड़े रहते , उसके धनी व्यापारी शिष्य अपनी तिजोरिया खोले रहते पर सीदी मौला ने कभी किसी से कुछ भी स्वीकार नही किया | दिल्ली के सुलतान से लेकर साधारण भिखारी तक सभी लोग उसके वैभव और शाही खर्च पर चकित थे | जनसाधारण का विश्वास था की सीदी को कीमियागिरी ( सोना बनाने की विधा ) का ज्ञान है , वह हर रात अथाह सोना बना लेता है |यह बात सच भी थी | सीदी मौला हर रात लाखो रुपयों का सोना चांदी बना लेता था , लेकिन कीमियागिरी से नही बल्कि ठगी , चोरी और डकैती से , वह सीमाप्रांत का धूर्त और पक्का ठग था , उसने दिल्ली में अपने पाखंड का ऐसा जाल फैला रखा था की उसकी ठगी , चोरी और धूर्तता का कुछ पता ही नही चलता , वह चोरो और ठगों का गुरु या सरदार था | उसके सभी साथी ठग , चोर डाकू इतने कुशल और घुटे थे की पकड़ में ही नही आते थे | यदि उसके गिरोह में से कभी कोई पकड़ भी लिया जाता तो सीदी मौला अपने प्रभाव से उसे छुडवा लेता | कयोकी दिल्ली का सबसे बड़ा काजी जलाल काशनी उसका अपना साथी और अव्वल दर्जे का बदमाश था | वह काजी इस गिरोह के फसने वाले आदमियों को कोई न कोई तिकड़म भिडाकर सजा से बचा लेता था | इस तरह सीदी मौला ने अपनी ठगी का ऐसा अटूट जाल फैलाया हुआ था की उसके फकीरी लिबास , पाखंड और सब को मुफ्त भोजन बाटने के ढोंग के पीछे उसके सारे कुकर्म छिपे रहते इस शक्तिशाली गिरोह में केवल चुने और परखे हुए ठग , चोर और डाकू ही भर्ती किये जाते थे | ये लोग चोरी का माल अपने महान गुरु के चरणों में अर्पित कर देते थे | इस गिरोह की एक रात और एक दिन की कमाई एक लाख रूपये से कम न थी | मौला ठगी और चोरी के माल में से कुछ अंश इन साथियो को बाट देता था और शेष को अपने खजाने में दाल लेता | इस गिरोह ने सारे उत्तर भारत में तहलका मचा रखा था | पाप की सारी कमाई खिंच -- खिंच कर सीदीमौला के पास जमा होने लगी थी | इन लोगो पर किसी कानून की छाया भी न पड़ती थी धर पकड़ के भय से मुक्त ये लोग निर्भय होकर अपनी '' कला '' का चमत्कार दिखाकर प्रजा को लुटते रहते थे | मौला के आश्रम में दिल्ली के सुलतान की भी एक न चलती थी | जनसाधारण इस रंगे सियार और मक्कार ठग के असली रूप से परिचित न था | उसकी ख्याति एक सच्चे फकीर के साथ -- साथ महादानी के रूप में फ़ैल रही थी | यह धूर्त व्यक्ति दिन में साधारण वस्त्र पहने कुरान के पाठ , नमाज , रोजा आदि में लींन रहता था | लेकिन रात आते ही उसकी जिन्दगी शाही ठाठ बाट आनंद भोग , बिलास सुरा सुंदरी की संगती में बीतती थी | यही उसकी असली जिन्दगी थी | यही उसका असली रूप था , लेकिन इस रूप से उसके कुछ विश्वस्त चेले ही परिचित थे | भारतीय जनता का सबसे बड़ा दोष है -- उसका अन्धविश्वास , यहाँ का जनसाधारण तर्क से काम न लेकर अंधश्रद्दा व भावना से प्रेरित होकर चलता है , वास्तविकता से आँखे बंद करने के कारण जब तब ठोकर खाकर गिर भी पड़ता है \ ये धूर्त साधू दान दक्षिणा के रूप में इनकी अंधश्रद्दा के बल पर खूब गुलछर्रे उड़ाते है | यहाँ तक की लोग अपने बच्चो को दूध , दही , फल आदि न देकर इन वैरागी संतो को चढा आते है | यह घृणित रीति मध्यकाल में और बुरी तरह प्रचलित थी | सीदी मौला की तरह के धूर्त इनके भरोसे खूब मौज करते थे | मौला के पाखंड का अड्डा जमने से कुछ वर्ष पहले की बात है , एक बार जब वह सीमा प्रान्त की ओर से दिल्ली आ रहा था तो अजोधन में अपने समय के प्रसिद्द सूफी संत शेख फरीद के दर्शनों के गया |मौला ने अपना सिर भक्तिभाव से इस महान तपस्वी के चरणों में रख दिया | उसकी ओर ध्यान से देखते हुए शेख फरीद ने उसे अमूल्य शिक्षा दी थी , ऐ सीदी , तू उस दिल्ली में जा रहा है जो हिन्दुस्तान के सुल्तानों और अमीरों की राजधानी है , यह नगरी राजनितिक कपटजाल , उखाड़ पछाड़ , षड्यंत्र और हत्याओं से भरी हुई जगह है | इसमें तू साधना करना चाहता है , तेरी मर्जी , लेकिन एक बात याद रखना , दिल्ली जाकर वह की आम जनता का दिल जीतना , पर खबरदार यहाँ के शहजादों अमीरों , खानों मलिकों और शाही मुलाजिमो से हेलमेल मत रखना , जहा तक तुझ से हो सके इनके दरवाजे पर मत जाना और इन्हें अपने दरवाजे पर मत फटकने देना | नही तू भारी मुसीबत में पड़ जाएगा , यदि ये लोग तेरे पास आने जाने लगे तो भी इनसे बातचीत हरगिज मत करना , यदि तू बातचीत भी करे तो राजनितिक मामलो पर तो भूल कर भी चर्चा , इनके साथ किसी षड्यंत्र में हिस्सा मत लेना | '' एक बात और याद रखना , फकीर तो बस फकीर ही होता है , उसके लिए सोने चांदी के टुकड़ो पर गिरना शोभा नही देता है , ऐ सीदी , याद रख , जब पास में जरूरत से ज्यादा धन इकट्ठा हो जाता है तो दिमाग में घुन लगा देता है | यदि तूने फकीरी लिबास ओढ़ कर सोना चांदी जमा किया तो तू बर्बाद हो जाएगा , यदि तूने मेरी सीख मान ली तो तेरी प्रतिष्ठा बढ़ेगी | यदि तूने दिल्ली के राजनितिक दलदल में कदम भी रखा तो उमे फंस कर तडप -- तडप कर मरेगा तेरी हड्डी तक का पता न लगेगा , फकीरों और दरवेशो को राजपाट के इन झंझटो से जहा तक हो सके दूर ही रहना चाहिए | इसी में उनकी शान है , इसी में उनकी इज्जत है | सीदी मौला ने सूफी संत का उपदेश सूना और उस पर अमल करने का आश्वासन दिया | वह दो तीन दिन शेख फरीद के आश्रम में रहा | फिर दिल्ली आ पंहुचा | इस माया नगरी के ऐश्वर्य की चकाचौध ने उसे पागल बना दिया | लूट खसोट के दबे संस्कार भड़क उठे और धीरे -- धीरे उसने बड़ी सावधानी से अपना पाखंड जाल पूरी तरह फैला दिया | एक सिद्ध फकीर और महान दानी के रूप में उसकी ख्याति फैलने लगी अर्थात उसके छ्टे हुए चेलो ने फैला दी | उसके दरवाजे पर बलबनी और खिलजी अमीर हाथ -- बांधे खड़े रहते थे , जब तक बलबन जीवित रहा तब तक उसके दबदबे , आतंक , कुशल प्रशासन मजबूत जासूस व्यवस्था से सहम कर सीदीमौला ने अपने पंख नही निकाले थे | वह फूंक फूंक कर कदम रखता था , लेकिन बलबन के मरने के बाद दयालु सुलतान जलालुद्दीन के शिथिल शासन में उसने अपना खूब रंग जमाया | बलबन के दरबारी अमीरों को कभी उसने पचास -- पचास हजार तक चांदी के सिक्के भेट किये थे | पर फिर भी वे अपने सशक्त स्वामी के भय से उसकी ओर आँखे उठा कर भी नही देखते थे | लौह पुरुष बलबन का शासन बड़ा दृढ था | उसने चोर डाकू और ठगों को जड़ से मिटा दिया था | लेकिन यह रंगा सियार सीदी मौला फकीरी वेश के कारण उसकी नजर में चढने से बच गया था | बलबन के मरते ही दुर्बल सुलतानो के समय उसका धंधा खूब चमका | वह अनाप -- शनाप खर्च करता था | चोर डाकुओ का सबसे बड़ा सरदार ख़ास राजधानी में सुलतान की नाक के नीचे एक दरवेश के वेश में पूजा जाता था | उसके साथी निडर होकर प्रजा को लुटते रहते थे | जलालुद्दीन के शासन काल ( 1290 -- 96 ) में सीदी मौला की प्रसिद्दी अपनी चरम सीमा तक पहुच चुकी थी | उसके प्रभाव में अत्यधिक वृद्दि हुई | सुलतान का बड़ा पुत्र खानखाना मौला का बहुत बड़ा भक्त और प्रशंसक था | सीदी उसे अपना पुत्र कहा करता था , सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के बड़े -- बड़े मलिक और अमीर वहा आया जाया करते थे | दिल्ली का प्रधान काजी जलाल काशानी मौला का विश्वस्त साथी था | यह काजी काफी रात गये तक मौला के साथ एकान्त में गुपचुप बाते किया करता था | सीदी मौला के चेलो द्वारा ठगी , चोरी और डकैती के कारण उसके गुप्त खजाने में सैकड़ो मन सोना चांदी , करोड़ो रूपये और मनो हीरे , मोती जवाहरात इकठ्ठे हो गये थे | यह खजाना सुलतान के शाही खजाने से टक्कर ले रहा था , धीरे -- धीरे इस अथाह खजाने की गर्मी उसके दिल और दिमाग पर असर करने लगी , उसके मन में दिल्ली का खलीफा बनने का विचार आया , वह अपने वैभव से बगदाद के खलीफा को भी पछाड़ देना चाहता था | इस महत्वाकाक्षा की पूर्ति के लिए उसने योजना बनानी आरम्भ कर दी , उसने अपने विश्वस्त साथियो से विचार -- विमर्श किया योजना आगे बढने लगी | जब सुलतान जलालुद्दीन खिलजी ने जून १1290 ई. में दिल्ली के सिहासन को हस्तगत किया और खिलजी वंश की नीव रखी तो बलबन के समय के बहुत से अमीर , मलिक , जागीरदार इस नये राज्य में दरिद्र हो गये थे | नये सुलतान ने उन के सारे इलाके और जागीरे छीन कर अपने विश्वस्त और वफादार साथियो को बाट दी | अब बलबनी अमीरों के पास कोई इलाका नही बचा था |, वे दर - दर के भिखारी बन गये थे और सीदी मौला के खानगाह से भोजन पाकर किसी तरह अपने दिन काट रहे थे | सीदी मौला के लिए इन पदच्युत आमिर और मलिकों से बढ़कर अच्छे सहायक और कहा मिल सकते थे , कयोकी अपनी जागीरे छीन जाने से इन के मन में खिलजियो के प्रति घृणा थी और बदला लेने की ताक में थे | वे सहज में ही सुलतान के खिलाफ षड्यंत्र में फंस गये | दिल्ली का कोतवाल विरजतन और हतिया पायक बलबनी शासन में बहुत बड़े पहलवान माने जाते थे और इन को लाखो जीतल वेतन मिलता था , लेकिन खिलजियो के राज्य में वे दाने -- दाने को मोहताज हो गये थे | ये लोग सीदी मौला के पास आने -- जाने लगे | पदच्युत अमीर और बहिष्कृत जागीरदार व मलिक तो यहाँ पहले से आते जाते थे | ये लोग और ठिकाना न होने से रात को वही सो जाते थे | सामान्य लोग यही समझते थे की संत के प्रति श्रद्दाभाव वश ये लोग दर्शन करने आते जाते है | दयालु सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्द अब बड़ी तेजी से षड्यंत्र शुरू हो गया | सीदी मौला के नेतृत्व में बलबनी मलिक और अमीर , प्रधान काजी जलाल काशानी , दिल्ली का कोतवाल विरजतन और हतिया पायक जैसे लोग सारी -- सारी रात बैठकर सुलतान की हत्या करने की योजना बनाने लगे | बहुत विचार - विमर्श के बाद योजना का अंतिम रूप इस प्रकार स्थिर हुआ --- जुमे के दिन जब सुलतान खिलजी घोड़े पर सवार होकर निकले तो फसादियो की तरह उस पर हमला करके उसकी हत्या कर दी जाए | और फिर सीदी मौला को राजगद्दी पर बैठा कर दिल्ली व पूरे हिन्दुस्तान का खलीफा घोषित कर दिया जाए | साथ ही दिवगंत सुलतान नासिरुद्दीन की बेटी से उसकी शादी कर दी जाए | काजी जलाल काशानी को '' काजिखान '' की उपाधि देकर मुलतान की सुबेदारी देना निश्चित हुआ | बलबनी दरबार के दूसरे अमीर और मलिकों को भी जहा तहा सूबे और इलाके जागीर में देने निश्चित हुए | इस षड्यंत्र में एक बहुत बकवादी और लालची आदमी भी शामिल था | जब मौला अपने चेलो को हिन्दुस्तान के सूबे बाट रहा था तो इस आदमी को जागीर में अपनी मनपसन्द का इलाका न मिला जिससे वह नाराज हो गया | उसने सुलतान जलालुद्दीन के पास जाकर इस सारे षड्यंत्र का भंडाफोड़ कर दिया | सुलतान के कानो में इस आशय की खबरे जासूसों द्वारा पहले पहुच गयी थी की सीदी मौला का निवास स्थान बलबनी दरबार के मलिक और अमीरों का अड्डा बना हुआ है | और कई कुख्यात डाकू वहा आते -- जाते देखे गये है , वह मामले को समझ नही पाया था पर अब सारी बात उसके दिमाग में बैठ गयी | एक दिन सुलतान जलालुद्दीन स्वंय वेश बदलकर उसके निवास स्थान पर गया वह उसने स्वंय अपनी आँखों से इन षड्यंतकारियों को संदेहजनक स्थिति में घूमते और सीदी मौला से गुपचुप बाते करते देखा था | दूसरे दिन उसने अपने सैनिको को भेजकर इन सब धूर्तो और षड्यंत्रकारियों के साथ सीदी मौला को कैद कर लिया | मौला की गिरफ्तारी से सारी दिल्ली में सनसनी फ़ैल गयी , मौला पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया | अगले दिन दरबार में इन सब षड्यंत्रकारियों की पेशी हुई | जब सुलतान ने अपनी हत्या का षड्यंत्र रचने और विद्रोह करने के विषय में पूछा तो उन्होंने इन आरोपों से साफ़ मना कर दिया | उन दिनों मार मारपीट कर अपराध स्वीकृत कराने का कोई कानून न था | इसीलिए सुलतान उससे सत्य न उगलवा सका | सब कुछ जानते हुए भी वह उन्हें कानून के अनुसार दंड नही दे सका | ये भयंकर षड्यंत्रकारी और राजद्रोही किसी प्रबल प्रमाण के अभाव में यो ही बेदाग छूटे जा रहे थे | सुलतान बड़े चक्कर में पड़ गया , वह चाह कर भी इन दुष्टों को कोई दंड नही दे पा रहा था उसे परेशान देखकर कुछ वजीरो ने कहा , '' यदि ये व्यक्ति सचमुच निर्दोष है तो इनकी अग्नि परीक्षा ली जाए ''| सुलतान को यह सुझाव बहुत पसंद आया , सीदी मौला तथा दूसरे धूर्तो की अग्नि परीक्षा के लिए अगले दिन प्रात: काल का समय निश्चित हुआ | दिल्ली में यदि सबसे सरल कोई काम है तो भीड़ इकठ्ठा करना | यदि कोई चूहा ही कुचल कर मर जाए या कोई यो ही मौज में आकर चीख पड़े तो एक मिनट में सौ दो सौ आदमी उसके आसपास इकठ्ठे हो जायेगे | फिर यदि किसी साधू -- सन्यासी की करामात की बात हो तो कहना ही क्या लाखो लोग तमाशा देखने के लिए टूट पड़ेगे | दिल्ली की तरह भारत के अन्य नगरो में भी यह मनोवृति देखने को मिलती है | मजमा लगाने वाले इसी भीड़ की बदौलत पेट पालते रहे है | सीदी मौला के मित्र और शत्रु सभी उसकी अग्नि परीक्षा का द्रश्य देखने के लिए आतुर हो उठे , कुछ लोग कहते थे की '' आग मौला का कुछ नही बिगाड़ सकती , दूसरे कहते थे जरा सुबह होने दीजिये देखते है क्या होता है | अग्नि परीक्षा का मसाचार आंधी की तरह दिल्ली तथा आसपास के इलाको में फ़ैल गया , हजारो लोग इस दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए भारपुर के मैदान की ओर उमड़ पड़े , जहा बहुत बड़ा अलाव जलाया जा रहा था , मैदान में एक ओर शाही शामियाना लगाया गया , सुलतान , उसके खान , मलिक , अमीर तथा दूसरे दरबारियों के लिए उपयुक्त स्थान बनाये गये | सुलतान यथा समय अपने दरबारियों के साथ मैदान में पंहुचा , लाखो लोग उत्सुकता से इस दृश्य को देखने के लिए जमा हो गये थे | सेना का पूरा प्रबन्ध वातावरण में सन्नाटा और बेचैनी थी | बहुत बड़े अलाव से आग की लपटे निकल रही थी कोयले दहक रहे थे , सीदी मौला और उसके चेले जंजीरों से जकड़े हुए एक ओर खड़े धडकते दिल से आग के शोलो की ओर देख रहे थे , सुलतान ने अपराधियों की सच्चाई परखने के लिए उन्हें आग में डालने के सम्बन्ध में वह बैठे हुए आलिमो , उलेमाओं से फतवा माँगा | अब अग्नि परीक्षा के लिए फतवा देने के सम्बन्ध में आलिमो में विचार विमर्श हुआ और सभी ने सर्वसम्मति से सुलतान को अपना यह निर्णय दिया , '' अग्नि परीक्षा शरा ( मुस्लिम कानून ) के विरुद्द है , अग्नि का गुण जलाना है और जिस प्रदार्थ का गुण जलाना हो , उसके द्वारा झूठ और सच की पहचान नही हो सकती है , फिर इतने लोगो के षड्यंत्र का हाल केवल एक व्यक्ति जानता है , इतने बड़े अपराध में केवल एक व्यक्ति की गवाही शरा की दृष्टि में विशेष महत्व नही रखती है '' | आलिमो के इस निर्णय को सुलतान ने स्वीकार कर लिया , उसने अग्नि परीक्षा का विचार त्याग दिया | इस षड्यंत्र के नेता काजी काशानी का तबादला बदायु में कर दिया बलबनी खानजादो और मलिकजादो को खोज खोज कर देश के दूर दूर के हिस्सों में इधर -- उधर भिजवा दिया | सुलतान की हत्या के लिए नियुक्त कोतवाल विरजतन और हतियापायक को कठोर दंड दिया , इन सब दुष्टों को दिल्ली से दूर भेजकर सुलतान ने उनके नेता महा धूर्त सीदी मौला की ओर ध्यान दिया |सुलतान जलालुद्दीन ने कुपित दृष्टि से इस धूर्त की और देखा |जो अब तक संत के रूप में उत्तर भारत के लाखो लोगो की श्रद्दा का पात्र बन बैठा था | लेकिन खास दिल्ली में डेरा जमाकर हिन्दुस्तान के सुलतान की हत्या करके स्वंय दिल्ली का खलीफा बनने का सपना देख रहा था | सुलतान ने इस पाखंडी को खूब आड़े हाथो लिया और अंत में दुखी होकर अपने पास बैठे अबुबकर सूफी हैदरी तथा उसके साथियो की ओर देखकर बोला "" ऐ दरवेशो , मेरा और इस मौला का न्याय कर दो '' अबुबकर हैदरी स्वतंत्र और उग्र विचारों का सूफी था और उसके सब साथी भी ऐसे ही थे | सुलतान की बात सुनकर हैदरी का एक शिष्य बहरी बड़ी निडरता से आगे बढ़ा और मौला के पास पंहुचकर उस्तरे था सुए से उसके शरीर को छेद -- छेद कर छलनी कर दिया | मौला दर्द के मारे तड़प गया , वह बुरी तरह तड़प रहा था पर उस के प्राण नही निकल रहे थे | यह देखकर सुलतान के पुत्र और अमीर अरकलीखान ने अपने महावत को इशारा किया , महावत हाथी को लेकर आगे बढ़ा , महावत का संकेत पाकर उस सधे हुए जंगी हाथी ने खून से लथपथ बुरी तरह घायल मौला को अपनी सूड में उठा लिया , उसे एक बार उपर हवा में में उछाला , जब वह अधमरा देह नीचे गिरा तो हाथी ने अपने भारी भरकम पैर उस पर टिका दिया और फिर उसे बुरी तरह रौद डाला | सबके सब देखते देखते मौला की हड्डिया चकनाचूर हो गयी , मांस के चीथड़े चीथड़े उड़ गये | धरती खून से रंग गयी , दिल्ली का खलीफा बनने के उसके सपने मिटटी में मिल गये | उस दिन सांयकाल दिल्ली में कालीपीली आंधी आई , उत्तर भारत में गर्मियों के मौसम में ऐसी काली पीली आंधिया प्राय: आती ही रहती है | लेकिन मौला के चेलो ने सुलतान को बदनाम करने के लिए यह बात फैलानी शुरू कर दी कि मौला की हत्या के कारण यह आंधी आई है | इस वर्ष पूरी बरसात न होने से अकाल की स्थिति पैदा हो गयी थी , लेकिन दयालु सुलतान ने सरकारी अन्न गोदामों के दरवाजे खोल दिए थे |सुलतान ने सरकारी अन्न गोदामों के दरवाजे खोल दी थे कुटिल लोगो ने इस अकाल की स्थिति को सीदी मौला की हत्या के साथ जोड़कर सुलतान की स्थिति कमजोर करने की कोशिश की लेकिन सुलतान की उदारता , दया और करुणा के सामने सब के मुंह बंद हो गये | सारे राज्य में सुलतान और उसके अमीरों की ओर से स्थान -- स्थान पर भोजनालय खोल दिए गये जहा अकाल पीड़ित निर्धनों को मुफ्त भोजन दिया जाताथा | अगले वर्ष खूब अच्छी वर्षा हुई , इतनी अधिक फसल की संभाले न संभली , लोग अकाल और सीदी मौला की मौत को भूल गये | -सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार व विचारक - आभार स . विश्वनाथ