कहां रहेगी चिड़िया -------- महादेवी वर्मा

कहां रहेगी चिड़िया ?
आंधी आई जोर-शोर से
डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ
कैसे यह घोंसला बनाएँ
कैसे फूटे अंडे जोड़ें
किससे यह सब बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

स्वर्णमुकुट

आज हम विश्व के महान वैज्ञानिको को भूलते जा रहे है | जिन्होंने इस आधुनिक जीवन में आधुनिक संसाधनों , सुविधाओं , मालो सामानों और सेवाओं का उपयोग तथा उपभोग के लिए आविष्कार किये | हमे यह याद रखना चाहिए कि उन सबके खोज आविष्कार में विश्व के महान वैज्ञानिकों ने अपना जीवन लगा दिया | उन महान कार्यो के लिए अदम्य कर्मठता व त्याग के साथ उन्होंने अपना सारा जीवन उस उद्देश्य को समर्पित कर दिया |

आज उन्ही खोजो -अविष्कारों के फलस्वरूप विकसित हुए संसाधनों से देश दुनिया की धनाढ्य कम्पनिया अरबो -- खरबों कमाती जा रही है | विडम्बना यह कि उन खोजो -- अविष्कारों के फलस्वरूप बने आधुनिक मालो -- सामानों मशीनों सेवाओं पर देश -- दुनिया की दिग्गज कम्पनियों का नाम व ट्रेड मार्क तो है पर उनकी खोज आविष्कार करने वाले वैज्ञानिको का कही कोई नाम नही है | लोग कम्पनियों को जानते है पर उसे खोजने वाले वैज्ञानिकों को नही जानते | यह उन महान वैज्ञानिकों के प्रति घोर उपेक्षा व कृतघ्नता का परिलक्षण है | यह परिलक्षण न केवल धनाढ्य कम्पनियों द्वारा ही नही किया जा रहा है , बल्कि उनके उपभोग से सुख -- सुविधा भोगते जा रहे समाज खासकर आम प्रबुद्ध समाज द्वारा भी किया जा रहा है |
प्राकृतिक विज्ञान के पितामह कहे जाने वाले सर्वथा योग्य महान वैज्ञानिक आर्कमिडिज का जन्म ईसा से 287 से पहले यूरोप के सिसली नगर में हुआ था | उस समय वह के राजा ने देवताओं को भेट चढाने के लिए एक स्वर्ण मुकुट तैयार करवाया | मुकुट बहुत सुन्दर था | पर राजा को यह सन्देह हो गया कि इस स्वर्णमुकुट में मिलावट की गयी है | इसकी जांच के लिए उन्होंने अपने खोजी प्रतिभा के लिए प्रसिद्धि पाए आर्कमिडिज को बुलाकर मुकुट को बिना तोड़े ही उसमे किसी मिलावट की जानकारी का कार्यभार दे दिया |आर्कमिडिज दिन -- रात इस समस्या को सुलझाने के चिन्तन मनन में लग गये | एक दिन उसी चिन्तन में वे सार्वजनिक स्नानागार में पानी से भरे टब में नहाने के लिए गये | उनके टब में जाते ही पानी का एक हिस्सा बाहर बह गया | उसे देखकर वे तुरन्त इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि कोई वस्तु किसी द्रव में डुबोई जाय तो उसके भार में होने वाले कमी वस्तु द्वारा हटाए गये द्रव के भार के बराबर होती है | अपने इस वैज्ञानिक निष्कर्ष से आर्कमिडिज इतने प्रफुल्लित हुए कि टब से बाहर निकल कर यूरेका -- यूरेका ( पा लिया -- पा लिया ) कहकर दौड़ते हुए अपने घर की ओर भागे |
इसी सिद्दांत को खोजकर उन्होंने पानी से भरे बर्तन में पहले मुकुट को डुबोया | फिर मुकुट के भार के बराबर सोना डुबोया | दोनों बार विस्थापित पानी के भर में अन्तर को देखकर उनोहे मुकुट को बिना तोड़े यह बता दिया कि इसमें मिलावट की गयी है |आर्कमिडिज का यह खोज आज भी वस्तुओ का आपेक्षित घनत्व मापने के लिए प्रयोग किया जाता है | इसी आधार पर आर्कमिडिज ने वस्तुओ के तैरने का सिद्धांत भी प्रतिपादित किया | आर्कमिडिज ने ही सबसे पहले लीवर का सिद्धांत प्रस्तुत किया | लीवर और घिरनियो द्वारा वे माल से भरे जहाज को अकेले ही किनारे तक उठा लाये |
आर्कमिडिज ने अपनी खोजो को लेकर कई पुस्तके भी लिखी | उसमे '' आन दि स्फीयर एण्ड सिलेन्डर '' मेजरमेन्ट आफ दि सर्किल '' आन फ्लोटिंग बाडीज '' आन बैलेन्सज एण्ड लीवर्स |

एक युद्ध के बाद ईसा पूर्व 212 सदी में आर्कमिडिज का गृह नगर रोम के कब्जे में आ गया | आर्कमिडिज बहुत दुखी हुए | 75 वर्ष की उम्र में आर्कमिडिज अपने घर में बैठे जमीन पर कुछ ज्यामितीय आकृतिया बना रहे थे | तभी कुछ सशत्र रोमन सिपाही उनके घर में घुस गये | वे अपने काम में इतने तल्लीन थे कि उन्हें सिपाहियों के आने का कुछ पता ही नही चला और वे अपने काम में लगे रहे | जब सिपाही उनकी ओर बढ़े तो वे अचानक बोल उठे -- '' इन आकृतियों को मत बिगाडिये| इतना सुनते ही सिपाही ने अपना भाला उनके शरीर में भोक दिया | आर्कमिडिज की तत्काल मृत्यु हो गयी | उनकी कथा अमर है | उनके खोज और आविष्कार अमर है | क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को मानव समाज को आगे बढाने के लिए समर्पित कर दिया न्योछावर कर दिया था |

-सुनील दत्ता
पत्रकार

हम जिनके ऋणी है -----------------------एक्स रेज के अविष्कारक -------- विल्हेलम कानराड रौटजन

एक्स रेज ( यानी एक्स किरणों ) का नाम जनसाधारण भी जानता है | इसका उपयोग चिकित्सा शास्त्र से लेकर अन्य दुसरे क्षेत्रो में भी बढ़ता जा रहा है | इसका आविष्कार प्रोफ़ेसर विल्हेलम कानराड रौटजन अपनी प्रयोगशाला में वैकुअम ट्यूब ( हवा निकालकर पूरी तरह से खाली कर दिए ट्यूब ) में बिजली दौड़ाकर उसके वाहय प्रभावों को देखने के लिए प्रयोग कर रहे थे | खासकर वे इस ट्यूब से निकलने वाले कैथोड किरणों का अध्ययन करनी चाहते थे | इसके लिए उन्होंने ट्यूब को काले गत्ते से ढक रखा था | जिससे उसकी रौशनी बाहर न जाए | प्रयोग के पूरे कमरे में अन्धेरा कर रखा था , ताकि प्रयोग के परिणामो को स्पष्ट देखा जा सके | ट्यूब में बिजली पास करने के बाद उन्होंने यह देखा कि मेज पर ट्यूब से कुछ दुरी पर रखा प्रतिदीप्तीशील पर्दा चमकने लगा |
रौटजन के आश्चर्य का ठिकाना नही रहा | उन्होंने ट्यूब को अच्छी तरह से देखा | वह काले गत्ते से ढका हुआ था | साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि ट्यूब के पास दूसरी तरफ पड़े बेरियम प्लेटिनोसाइनाइड के कुछ टुकड़े भी ट्यूब में विद्युत् प्रवाह के साथ चमकने लग गये है | रौटजन ने अपना प्रयोग कई बार दोहराया | हर बार नलिका में विद्युत् प्रवाह के साथ उन्हें पास रखे वे टुकड़े और प्रतिदीप्ती पर्दे पर झिलमिलाहट नजर आई | वे इस नतीजे पर पहुचे कि ट्यूब में से कोई ऐसी अज्ञात किरण निकल रही है , जो गत्ते की मोटाई को पार कर जा रही है | उन्होंने इस अज्ञात किरणों को गणितीय चलन के अनुसार एक्स रेज का नाम दे दिया | बाद में इसे रौटजन की अविष्कृत किरने रौटजन रेज का नया नाम दिया गया | लेकिन तब से आज तक रौटजन द्वारा दिया गया ' एक्स रेज ' नाम ही प्रचलन में है | बाद में रौटजन ने एक्स रेज पर अपना प्रयोग जारी रखते हुए फोटो वाले खीचने वाले फिल्म पर अपनी पत्नी अन्ना बर्था -- का हाथ रखकर एक्स रेज को पास किया | फोटो धुलने पर हाथ की हड्डियों का एकदम साफ़ अक्स फोटो फिल्म पर उभर आया | साथ में अन्ना बर्था के उंगलियों की अगुठी का भी अक्स आ गया | मांसपेशियों का अक्स बहुत धुधला था | फोटो देखकर हैरान रह गयी अन्ना ने खा कि मैंने अपनी मौत देख ली ( अर्थात मौत के बाद बच रहे हड्डियों के ढाचे को देख लिया |
एक्स रेज के इस खोज के लिए रौटजन को 1901में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र के लिए निर्धारित पहला नोबेल पुरूस्कार मिला | रौटजन ने वह पुरूस्कार उस विश्व विद्यालय को दान कर दिया | साथ ही उन्होंने अपनी खोज का पेटेन्ट कराने से भी स्पष्ट मना कर दिया और कहा कि वे चाहते है कि इस आविष्कार के उपयोग से पूरी मानवता लाभान्वित हो | रौटजन का जन्म 27 मार्च 1845 में जर्मनी के रैन प्रांत के लिनेप नामक स्थान पर हुआ था | उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हालैण्ड में हुई तथा उच्च शिक्षा स्विट्जरलैंड के ज्युरिच विद्यालय में हुई थी | यही पर उन्होंने 24 वर्ष की आयु में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की | वह से निकलकर उन्होंने कई विश्व विद्यालय में अध्ययन का कार्य किया | 1888 में वे बुर्जवुर्ग विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफ़ेसर नियुक्त किये गये | यही पर 1895 में उन्होंने एक्स रेज का आविष्कार किया | 1900 में वह म्यूनिख विश्वविद्यालय चले गये |
वह से सेवा निवृत्त होने के बाद म्यूनिख में 77वर्ष की उम्र में इस महान वैज्ञानिक की मृत्यु हो गयी | जीवन के अंतिम समय में उन्हें ऑटो का कैंसर हो गया था | आशका जताई जाती है कि उन्हें यह बीमारी एक्स रेज के साथ सालो साल प्रयोग के चलते हुई थी |

बौनों की दुनिया

प्रकृति का रहस्य भी अनोखा है आज का इंसान इसे जितना सुलझाता है यह और उलझता जाता है | मानव विकास क्रम में विज्ञानं की दुनिया को अनोखा बनाया सारी सुविधाए हासिल की पर अभी तक बहुत सी ऐसी चीजे है जो मानव् से दूर है मानव् आज तक यह नही बता पाया कि मनुष्य बौने के रूप में जन्म क्यों लेता है यह आज भी अनुत्तरित प्रश्न है -- आइये आज बौनों की दुनिया में चलते है -------------------------------

रहस्य अभी सुलझा नही है कि क्यों दुनिया में बौने पैदा होते है | लेकिन इससे जुड़े तमाम किस्से सुर्खियों में रहते है | बौनों को लेकर अनेक चर्चित कहानिया भी लिखी गयी है | दुनिया के कुछ चर्चित बौनों की जिन्दगी पर कुछ बाते
इस दुनिया में बहुत से '' बौने '' ऐसे भी हुए है जो अपने आपमें बेमिशाल रहे | आप देखे 17 वी शताब्दी में आस्ट्रेलिया में '' फ्रेबा '' नामक ऐसे बौना हुआ जिसकी लम्बाई मात्र दस इंच थी , उसके गंजे सिर पर हरे रंग के आठ - दस बाल थे उसका वजन मात्र नौ किलो था | यह बौना एक सर्कस में काम करता था और दर्शको के सामने हैरत अंगेज भरे करतब करता था , वह कभी - कभी शेर और भालू से कुश्ती भी लड़ता था और उसकी पीठ पर खड़े होकर सवारी भी करता था |

आज से 250 वर्ष पूर्व जर्मनी के हेनर्ब शहर में एक अनोखा बौना पैदा हुआ था | जन्म से ही उसके हाथ - पैर न थे | उसके दोनों कन्धो से बिना नाख़ून के उगलियों जैसे मांस के कुछ टुकड़े उभर आये थे | उन्ही से वह उगलियों और हाथो का काम लेता था | हैरत की बात है , हाथ न होते हुए भी वह दाढ़ी बना लेता | पिस्तौल में गोली भरकर हवाई फायर भी कर देता था | यही नही , वह एक अच्छा चित्रकार भी था | जर्मनी के कई घरो की बैठको में इसकी हँसती मुस्कुराती तस्वीरे आज भी उस जगह की शान बनी हुई है |
स्पेन का '' जेनफर '' बौना सन 1802 में पैदा हुआ था उसकी मौत 1884 को हुई | मृत्यु के समय इस बौने की लम्बाई सिर्फ नौ इंच थी | जेनफर ने अदभुत प्रेम कविताएं लिखी थी जो आज भी स्पेन के प्रेमियों के लिए अविस्मर्णीय यादगार तोहफे के रूप में अमर- कृति बनी हुई है | संसार का सबसे चर्चित बौना 9 अगस्त 1815 को इंग्लैण्ड के '' विर्चा '' गाँव में पैदा हुआ था | 15 वर्ष की आयु में उसका वजन मात्र 28 किलो पौंड तथा कद सिर्फ सवा सात इंच था | यह बौना अक्सर अपना दादा जी की लम्बी कोट में बैठकर घुमने जाता था | न्यूयार्क का '' हडसन रौबरी '' तो इतिहास का प्रसिद्द अनोखा चरित्र है | वह चार्लुस प्रथम की गुप्तचर सेना में जासूस था | उसकी लम्बाई 12 इंच तथा वजन 42 पौंड था | इसकी मुछो की लम्बाई 13 इंच थी | वह अक्सर अपनी मुछो को बांधकर रखता था | पुरुषो की तरह महिलाये भी बौनी होती है , सिसली की मिस ' रोलिना '' का कद 18 इंच था | वह 10 वर्ष तक जीवित रही | उसका अस्थि पंजर आज भी लन्दन के '' कालेज आफ सर्जन '' में एक कांच के जार में सुरक्षित है |

मिस ' एकर्स कैरी '' विश्व की सबसे मोती बौनी महिला थी | उनका कद 16 इंच था , लेकिन वजन 260 पौंड था | अपने दोहरे आकर्षण के कारण वह अपने समय की एक चर्चित महिला बन गयी थुई |
रूस की बौनी युवती ' ब्रेनी '' तो खुबसूरत तो थी ही | उसकी लम्बाई 26 इंच थी वह 18 वर्ष तक जीवित रही | वह अपने सलोने बदन पर हमेशा ऐसे परिधान पहनती कि राह चलते लोग उसे मुड- मुडकर बार - बार देखा करते ---------------------------------- कबीर


------------------------------------------------------------------------साभार दैनिक '' आज ''

हथियारों का अन्तराष्ट्रीय बाजार और भ्रष्टाचार

बढ़ते रक्षा बजट के जरिये देश की सुरक्षा का कोई काम हो या न हो , लेकिन हथियार कम्पनियों को जबर्दस्त लाभ दिया जा रहा है तथा उनके वैश्विक व्यापार बाजार की सुरक्षा भी की जा रही है |

आधुनिक और अत्याधुनिक हथियारों के अन्तराष्ट्रीय बाजार के व्यापार को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए
बढ़ाने की कोशिश है पर यह सच नही है बल्कि पूरी दुनिया के हथियारों के सौदागरों को बड़ी पूंजी का मालिक बनाया जा रहा है | अपितु यह राष्ट्र पर निर्भर बनाने व साथ -- साथ देश को असुरक्षित करता जा रहा है | एक अन्तराष्ट्रीय संस्थान की रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व व्यापार व आयात निर्यात में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हथियार उद्योग में होता है | प्रकाशित सूचनाओं के अनुसार हथियारों के विश्व व्यापार में विश्व की कुल 10 कम्पनियों का वर्चस्व है | यह बात जग जाहिर है क़ि ये कम्पनिया अमेरिका , इंग्लैण्ड , रूस ,फ्रांस , जर्मनी जैसे देशो की साम्राज्यी कम्पनिया है | विश्व पैमाने के हथियार उद्योग में इन्ही कम्पनियों का वर्चस्व है | इनमे कोई व्यापारिक होड़ नही है | यह होड़ इन कम्पनियों के बीच है | राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इन कम्पनियों के आधुनिक हथियारों एवं अन्य साजो -- सामानों की माँग विश्व के सभी पिछड़े व विकासशील देशो में न केवल बरकरार है बल्कि इन देशो के बीच मौजूद आपसी तनाव झगड़ो व युद्धों के कारण यह माँग बढती जा रही है | उदाहरण भारत -- पाकिस्तान के बीच तनाव व युद्ध की बारम्बार की स्थितियों के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर दोनों देशो द्वारा रक्षा बजट बढाने के साथ हथियारों की खरीद को तेजी से बढाया जाता रहा है | रक्षा सौदों में सर्वाधिक भ्रष्टाचार के कारण में एक तो आधुनिक हथियार व अन्य साजो सामान के उत्पादन व व्यापार में साम्राज्यी कम्पनियों का ही विश्वव्यापी एक छत्र राज फिर निसंदेह: आपसी होड़ | इन आधुनिक हथियारों के उत्पादन व व्यापार में कम्पनियों द्वरा
अधिकाधिक मूल्य अर्थात उनके वास्तविक मूल्य से कई गुना ज्यादा वसूला जाता है जो अरबो में नही बल्कि खरबों में पहुंचता है , इस लिए इस मूल्य से करोड़ो , अरबो का कमीशन खोरी देने का काम भी आम तौर पर होता रहता है | आज से 25 वर्ष पहले बोफोर्स तोप में 60 करोड़ के कमीशन के साथ करोड़ो की दलाली की भी चर्चा बार - बार होती रही | इस भ्रष्टाचार का दुसरा बड़ा आधार विश्व के भारत , पाक जैसे लागभग 150 विकासशील पिछड़े देशो के बीच आपसी तनाव तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हथियार कम्पनियों से अधिकाधिक हथियारों व साजो-- सामानों की उच्च मूल्यों पर बढाकर खरीदारी की जाती रही है | इसी के साथ रक्षा सौदों में राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बरती जा रही गोपनीयता भी रक्षा सौदों के भ्रष्टाचार को और अधिक बढावा देने का एक कारण यह भी है |
रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार अन्तराष्ट्रीय स्तर की दलाली से लेकर , किसी देश के मंत्रियों , सांसदों , उच्च स्तरीय सैन्य व गैर सैन्य अधिकारियों को करोड़ो की दलाली कमीशन देने तक ही सीमित नही है , बल्कि अन्य रूपों में भी मौजूद है उदाहरण , ये साम्राज्यी कम्पनिया अपने देशो के अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारियों से लेकर खासकर रक्षा अधिकारियों से लेकर खरीदार देशो के अवकाश प्राप्त रक्षा अधिकारियो को अपना स्थायी वेतन भोगी सेवक व दलाल बना लेती है | ताकि सौदों को पटाने में अपने देश के रक्षा मंत्रालय और सरकार पर खरीददार देशो के रक्षा मंत्रालय और सरकार पर इन पूर्व संबंधो एवं प्रभावों का व्यापारिक इस्तेमाल किया जा सके | विदेशी पूंजी व तकनीक पर निर्भर और उनसे साठ -- गाठ करती रही भारत जैसे देशो की बड़ी कम्पनिया भी विभिन्न साम्राज्यी हथियार कम्पनियों की वकालत में जुट जाती है | इसके अलावा साम्राज्यी हथियार कम्पनियों द्वारा राजनितिक पार्टियों को अधिकाधिक चंदा देने से लेकर अपने देशो के रक्षा मंत्रियों , सांसदों आदि को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कमिशन भेट देना भी हथियार व्यापार का अन्तराष्ट्रीय दस्तूर बना हुआ है | जाहिर सी बात है की करोड़ो अरबो का यह भ्रष्टाचार हथियारों के अन्तराष्ट्रीय बिक्री व्यापार की कमाई के जरिये ही किया जाता है | इस कमाई का अंदाजा भारत -- पाक जैसे देशो के रक्षा बजट से लगाया जा सकता है , जो साल - दर-- साल बढ़ता जा रहा है | भारत में भी देश का बढ़ता बजट का 15 % से उपर पहुंचता है | लाखो -- करोड़ो के इस बजट का लगभग 60 % से 70 % हिस्सा अन्तराष्ट्रीय हथियार कम्पनियों के पास पहुंचता है | फिर बीते समय के साथ अधिकाश पुराने हथियार धरे - के धरे रह जाते है | उनकी जगह साम्राज्यी कम्पनिया अपनी नयी तकनीकि खोज -- प्रयोगों के जरिये नए आधुनिक हथियाओ को आगे ला देती है उसे खरीदने के जरिये दवाव डालने लग जाती है | फलस्वरूप बढ़ते रक्षा बजट के जरिये देश की सुरक्षा का कोई काम हो या न हो , लेकिन हथियार कम्पनियों के अधिकाधिक लाभ ( एकाधिकारी लाभ ) को तथा उनके वैश्विक व्यापार बाजार की सुरक्षा जरुर हो जाती है | साथ ही '' सुरक्षा '' होती है उन दलालों कमीशनखोरो की , जिन्हें कम्पनी अपने लाभ का एक छोटा सा हिस्सा करोड़ो की रकम के रूप में खिला --- पिला देती है | यह काम केवल हथियार बेचने वाली साम्राज्यी कम्पनिया ही नही करती है , बल्कि सभी क्षेत्रो की साम्राज्यी कम्पनिया करती है | ऐसा करना वस्तुत: उनके साम्राज्यी चरित्र का अहम हिस्सा है | अपने वैश्विक व्यापार बिक्री के साथ वैश्विक बाजार को एकाधिकार बढाने के लिए उपरोक्त भ्रष्टाचारी हथकंडे अपनाना भारत -- पाक जैसे देशो की सरकारों , सांसदों , मंत्रियों तथा आला अधिकारियो को पोर -- पोर से भ्रष्ट बनाना , उनकी चारित्रिक विशेषता है |
साम्राज्यी कम्पनियों का यह लुटेरा व भ्रष्टाचारी चरित्र इस देश को देश के जनसाधारण को खोखला करता जा रहा है | इसके अलावा विदेशी कम्पनियों के साथ गठ - जोड़ करती देश की बड़ी कम्पनिया भी यही काम करती रही है | देश की सत्ता सरकारे व अन्य हुक्मती हिस्से भी इन्हें बहुराष्ट्रीय व देशी कम्पनियों के हितो को बढाने और उसकी सुरक्षा करने में लगे रहे है | देश की आत्म निर्भरता तथा रक्षा -- सुरक्षा अब इनकी चिंता का मामला नही रह गया है | फल स्वरूप राष्ट्र व राष्ट्र का जन साधारण अधिकाधिक असुरक्षित होता जा रहा है | न ही राष्ट्र की आंतरिक एकता व सुरक्षा मजबूत हो पायी और न ही वाह्य सुरक्षा ही | इसका सबूत आंतरिक व क्षेत्रीय उथल - पुथल व अलगाववादी झगड़ो -- विवादों से लेकर वाह्य घुस - पैठियो आदि के रूप में मौजूद है | साफ़ दिख रहा है की आधुनिक और अत्याधुनिक हथियारों के अन्तराष्ट्रीय व्यापार के जरिये बढाया जा रहा मामला राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में नही जा रहा है बल्कि वह राष्ट्र को पर निर्भर बनाने के साथ -- साथ अधिकाधिक असुरक्षित भी करता जा रहा है | आज फिर इस देश के आम --- आवाम को जागना होगा और मुझे कामरेड बल्ली सिंह चीमा की यह लाइन याद आ गयी >>>>>>>>>>>>>>>>>>>
जनता के हौंसलों की सड़कों पर धार देख ।
सब-कुछ बदल रहा है चश्मा उतार देख ।

जलसे-जुलूस नाटक, हर शै पे बन्दिशें,
करते हैं और क्या-क्या भारत के ज़ार देख।

तू ने दमन किया तो हम और बढ़ गए,
पहले से आ गया है हम में निखार देख ।

हैं बेलचों, हथौड़ों के हौंसले बुलन्द,
ये देख दु्श्मनों को चढ़ता बुखार देख ।

तेरी निजी सेनाएँ रोकेंगी क्या इन्हें,
सौ मर गए तो आए लड़ने हज़ार देख ।

सच बोलना मना है गाँधी के देश में,
फिर भी करे हिमाक़त ये ख़ाकसार देख ।
-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

क्रांतिकारी वीरांगना प्रीतिलता वादेदार


देश के क्रांतिकारी वीरो और वीरांगनाओ का इतिहास महज उनके गौरवशाली शाहदत का ही नही है , अपितु यह 1947 में राष्ट्र को प्राप्त "समझौतावादी स्वतंत्रता " के विपरीत 'क्रांतिकारी - स्वतंत्रता ' के लक्ष्यों , उद्देश्यों का भी इतिहास है | उनके ये लक्ष्य इस राष्ट्र को ब्रिटिश राज से मुक्ति के साथ - साथ उसकी आर्थिक , शैक्षणिक , सांस्कृतिक परनिर्भरता व परतंत्रता के संबंधो से भी मुक्ति के लिए निर्धारित किए गये थे |इन्ही लक्ष्यों के अनुरूप वे अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को चलाते भी रहे थे |यह हिंसा और अहिसा का प्रश्न नही है , बल्कि क्रांतिकारी स्वतंत्रता के उद्देश्यों और लक्ष्यों का सवाल है |
लेकिन इतिहास की बिडम्बनापूर्ण कटु सच्चाई यह है की भगत सिंह जैसे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारियो तक के प्रमुख लक्ष्य व उद्देश्य देशवासियों के लिए आज भी अज्ञात है | वर्तमान दौर में राष्ट्र की और राष्ट्र की बहुसख्यक जनसाधारण की निरन्तर बढती और घहराती समस्याओं में इन क्रान्तिकारियो और उनके उद्देश्यों लक्ष्यों को जानना नितांत प्रासंगिक है |इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी है कि अमेरिका ब्रिटेन जैसी साम्राज्यी ताकते और उसका इस राष्ट्र पर बढ़ता जा रहा प्रभुत्व -प्रभाव ही वर्तमान दौर कि समस्याओं का सर्वप्रमुख कारण व कारक बना हुआ है |
इसलिए उनसे मुक्ति के वास्ते इतिहास में क्रान्तिकारियो द्वारा घोषित उद्देश्य व लक्ष्य तथा उनके क्रांतिकारी संघर्ष , त्याग और बलिदान वर्तमान दौर में न केवल स्मरणीय है , अपितु अनुकरणीय भी है | लेकिन अब यह बात केवल देश के जनसाधारण हिस्से के लिए सच है | देश के धनाढ्य व उच्च हिस्सों के लिए नही हैक्योंकि देश का यह अल्पसख्यक पर साधन सम्पन्न व प्रभुत्व सम्पन्न हिस्सा इन लुटेरी व प्रभुत्वकारी साम्राज्यी ताकतों के साथ एकजुट हो गया है |निरन्तर एकजुट होता जा रहा है | इसलिए भी वह राष्ट्र के क्रान्तिकारियो कि जीवनियो व संघर्षो को खासकर उनके उद्देश्यों व लक्ष्यों को आम जनता से छिपाने का प्रयास भी करता रहा है |
इसीलिए राष्ट्र के आम जन को उन उद्देश्यों व लक्ष्यों के प्रति सजग व सक्रिय बनाने के लिए क्रान्तिकारियो के संघर्षो को जानने बताने में प्रबुद्ध जनसाधारण कि भूमिकाये अब आवश्यक एवं अपरिहार्य बन गयी है |
प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई 1911 को तब के पूर्वी हिन्दुस्तान और अब बंगला देश में स्थित चटगाँव के एक गरीब घर में हुआ था | उनके पिता नगरपालिका के क्लर्क थे | स्कूली जीवन में ही वे बालचर - संस्था की सदस्य हो गयी थी |वहा उन्होंने सेवाभाव और अनुशासन का पाठ पढ़ा |बालचर संस्था में सदस्यों को ब्रिटिश सम्राट के प्रति एकनिष्ट रहने की शपथ लेनी होती थी | संस्था का यह नियम प्रीतिलता को खटकता था | उन्हें बेचैन करता था | यही उनके मन में क्रान्ति का बीज पनपा था | बचपन से ही वह रानी लक्ष्मी बाई के जीवन - चरित्र से खूब प्रभावित थी इंटर नेट से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार उन्होंने 'डॉ खस्तागिर गवर्मेंट गर्ल्स स्कूल चटगाँव से मैट्रिक की परीक्षा उच्च श्रेणी में पास किया | फिर इडेन कालेज ढाका से इंटरमिडीएट की परीक्षा और ग्रेजुएशन नेथ्यून कालेज कलकत्ता से किया | यही उनका सम्पर्क क्रान्तिकारियो से हुआ | शिक्षा उपरान्त उन्होंने परिवार की मदद के लिए एक पाठशाला में नौकरी शुरू की | लेकिन उनकी दृष्टि में केवल कुटुंब ही नही था , पूरा देश था | देश की स्वतंत्रता थी | पाठशाला की नौकरी करते हुए उनकी भेट प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई |प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बनी | पहले भी जब वे ढाका में पढ़ते हुए छुट्टी में चटगाँव आती थी तब उनकी क्रान्तिकारियो से मुलाक़ात होती थी और अपने साथ पढने वाली सहेलियों से तकरार करती थी कि वे क्रांतिकारी अत्यंत डरपोक है | लेकिन सूर्यसेन से मिलने पर उनकी क्रान्तिकारियो के विषय में गलतफहमी दूर हो गयी | एक नया विश्वास कायम हो गया | वह बचपन से ही न्याय के लिए निर्भीक विरोध के लिए तत्पर रहती थी | स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने शिक्षा विभाग के एक आदेश के विरुद्ध दूसरी लडकियों के साथ मिलकर विरोध किया था | इसीलिए उन सभी लडकियों को स्कूल से निकाल दिया गया |प्रीतिलता जब सूर्यसेन से मिली तब वे अज्ञातवास में थे | उनका एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था | उनको फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी | उनसे मिलना आसान नही था |लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली |और किसी अधिकारी को उन पर सशंय भी नही हुआ | यह था , उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण | इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व कि इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बनी | पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था घिरे हुए क्रान्तिकारियो में अपूर्व सेन , निर्मल सेन , प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे |सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया |अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये |सूर्यसेन की गोली से कैप्टन कैमरान मारा गया | सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते - लड़ते भाग गये |क्रांतिकारी सूर्यसेन पर 10 हजार रूपये का इनाम घोषित था |दोनों एक सावित्री नाम की महिला के घर गुप्त रूप से रहे | वह महिला क्रान्तिकारियो को आश्रय देने के कारण अंग्रेजो का कोपभाजन बनी |सूर्यसेन ने अपने साथियो का बदला लेने की योजना बनाई | योजना यह थी की पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच - गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए |प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी वह पहुचे | 24 सितम्बर १९३२ की रात इस काम के लिए निश्चित की गयी |हथियारों से लैस प्रीतिलता ने आत्म सुरक्षा के लिए पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था | पूरी तैयारी के साथ वह क्लब पहुची |बाहर से खिड़की में बम लगाया | क्लब की इमारत बम के फटने और पिस्तौल की आवाज़ से कापने लगी | नाच - रंग के वातावरण में एकाएक चीखे सुनाई देने लगी |13 अंग्रेज जख्मी हो गये और बाकी भाग गये |इस घटना में एक यूरोपीय महिला मारी गयी |थोड़ी देर बाद उस क्लब से गोलीबारी होने लगी | प्रीतिलता के शरीर में एक गोली लगी |वे घायल अवस्था में भागी लेकिन फिर गिरी और पोटेशियम सायनाइड खा लिया | उस समय उनकी उम्र 21 साल थी | इतनी कम उम्र में उन्होंने झांसी की रानी का रास्ता अपनाया और उन्ही की तरह अंतिम समय तक अंग्रेजो से लड़ते हुए स्वंय ही मृत्यु का वरण कर लिया
प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद अंग्रेज अधिकारियों को तलाशी लेने पर जो पत्र मिले उनमे छपा हुआ पत्र था | इस पत्र में छपा था की " चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा , वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा | यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी |"
इतनी छोटी उम्र में प्रीतिलता ने महान कार्य की नीव रखी |वे क्रांतिकारी के साथ एक निर्भीक लेखिका भी थी | वे निडर होकर लेख लिखती थी |कुमारी प्रीतिलता का यह बलिदान भावी पीढ़ी तक युवतियों के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगा |

साभार राजेन्द्र पटोरिया की 50 क्रांतिकारी पुस्तक और इंटर नेट से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर लिखा गया लेख

-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक