ताज

आहिस्ता बोलो ! आहिस्ता ! भारत की दो विभूतिया सोयी हुई है | उनको सोये आज तीन सदिया हो गयी है | तीन सदियों से लगातार सुगन्धित द्रव्यों का धुँआ उठता और उस सफेद चदोवो से टकरा - टकरा कर लौटा रहा है , उन उछ्वासो के साथ जो वहा के हवा के साथ घुले - मिले है जिन्हें किसी ने कभी न देखा , '' न तब न अब |
आहिस्ता बोलो !
आहिस्ता बोलो ! वरना तुम्हारी ही आवाज तुम्हे काटने लगेगी जैसे वह आज सदियों से जोर से बोलने वालो को काटती रही है | दो विभूतिया यहाँ सोयी है , दोनों पत्थर से दबी हुई , दोनों जिनकी शान के सामने खुदा की शान पानी भर्ती थी | दो दिल अश्वेत पत्थरों के नीचे दबे पड़े है | एक में शेर को दहला देने की ताब थी दुसरे में कोयल के कुक सुन गुलाब की पंखुडियो -- सी काँप जाने की नजाकत | धीरे बोलो !

धीरे -- धीरे दस्तक दो | इस शांतिमय वातावरण को क्षुब्ध न करो | शांति , श्मशान की शान्ति है यह , समाधियो की जिनमे विभूतिया सोयी है | यह ताज है , ताजमहल , ताज का हृदय , अन्तस्तला मुमताज महल की कब्र है यह , आर्जुमन्द बानू बेगम की |
उस कमनीय रमणीयता की जिसके अन्दर -- बाहर को ईरान के अभिजात्य कुल के सर्वस्य ने सिरजा और निखारा था , बिगड़े अमीरजादा ग्यास के अरमानो ने , बने एतामादुद्लौला की वजीरी दौलत ने आसफ के लाड ने |
अल्हड मुमताज की मजार है यह जिसकी हल्की नजरो ने संगदिल खुर्रम के अन्तर में दरार दाल दी थी | संगदिल खुर्रम जिसके आगमन से क्या देशी क्या फिरंगी सभी दरबारियों में एक सर्द लहर दौड़ जाती थी | उसी मुमताज ने उस कठोर सैनिक के हृदय में आंधी उठा दी थी जो माँ बाप तक को कैद में दाल देने से न चुका था , जिसकी तलवार की चमक ने फरगना से दक्कन तक चकाचौध पैदा कर दी थी |
इस समाधि गृह में इसकी रहस्यमय चुप्पी में एक पुकार है , एक मिली -- जुली चीत्कार | इसकी से -- से में एक बोझिल आवाज उठती है जो इन मजारो में सोने वाले शहंशाह और आर्जुमन्द बानू की नही , उन भूतो की है जो अपनी मौत से नही मरे , जो कयामत के रोज भी न उठेगे , जो गुम्बद से गिर कर दरगोर हो गये थे , नव में दब गये थे , जिनकी चीख इमारत की ईट - ईट से निकल रही है |
फिर भी समाधि गृह में शान्ति है | शान्ति , कि मधुर कोमल आवाज गूंज सके | मधुर कोमल आवाज ही वहा प्रतिध्वनित होती है , हो सकती है , अशिष्ट , वल्गर नही | हल्का कोमल स्वर धीरे धीरे उठाकर पसर चलता है निरंतर पसरता जाता है उसकी प्रतिध्वनी कोने -- कोने से उठकर वितान तक पहुचती है , फिर जैसे उतर आती है , फिर चद्ती है फिर उतरती है , पसर -- पसर | फिर -- फिर | यह गूंज अविराम जारी रहती है सोयी विभूतियों को अपने साए में करती , उनकी सुप्त चेतना को जगाती |

समाधियो का यह गर्भगृह मध्यवर्ती कमरे के ठीक नीचे है उसके चारो और आठ कमरे है कुरान का पाठ करने वाले मुल्लो के लिए , कोमल स्वर में भारतीय और ईरानी राग ध्वनित करने वाले गायकों के लिए

और यह मध्यवर्ती कमरा -- यह प्रशांत विश्रामगृह शब्द नही जो इसके सयत सौन्दर्य का ब्यान कर सके मान भाषा में शक्ति नही जो दूर के अधखुले वातायनो से आते दबे आलोक की कोमल छाया में बिखरती छवि का वर्णन कर सके | कब्रों के चतुर्दिक दौड़ती संगमरमर की जाली स्वय कला का आश्चर्य है | साम्रज्य के अनन्त साधनों के वावजूद यह जाली दस साल में कट कर तैयार हुई थी | दस साल , देहलवी सल्तनत के दस जिसके साए में पूरब -- पश्चिम समुंदर टकराते थे , काबुल और दौलताबाद की दौलत बरसती थी | दस्तकारो की उस चुनी दुनिया के कुशल कलावन्तो ने कला के उस चमत्कार को प्रस्तुत किया था , दस साल में |
मुमताज की समाधि बीच में है , ठीक बीच में और मजार का सफेद पत्थर कभी न मुरझाने वाले ईरानी फूलो का बाग़ बन गया है | शाश्वत विकसित वाटिका का यह सौन्दर्य , ईरानी बाग़ का यह सदाबहार , मुग़ल कलम का जादू ही ईजाद कर सकता था | जिस खूबी के साथ मुग़ल कलम का जादूगर अपने चित्रों का हाशिया लिखता था उसी बारीकी से संगतराश ने अपनी छेनी से यह फूलो का बाग़ उगा दिया है | और इस मजार पर कभी न मलिन न होने वाले मनोरम अक्षरों में खुदा है -- '' आर्जुमन्द बानू बेगम मुमताज महल की मजार '' मृत्यु 1040 हिजरी |

बहरी मेहराबी दरवाजा जो करवा -- सराय से घिरा है , नितान्त सुन्दर है , सिकन्दरा के अकबरी मकबरे के दरवाजे से भी सुन्दर | उसके बिचले मेहराब पर संगमूसा के बारीक हर्फो में खुदा है --- '' पाक दिल बहिश्त के बाग़ में प्रवेश करे '' |

इस दरवाजे से ताज का सर्वांग पंख फैलाए उठता -- सा दिखता है -- नीचे सामने के जल में उसकी छाया झिलमिल करती है | सफेद , चांदी की परि -- सी इमारत जमीन पर ऐसी हल्की -- फुलकी बैठी है कि लगता है , क्षण भर में एक साथ पर मार कर उड़ जायेगी | सादगी का सौन्दर्य दुनिया ने और नही देखा | इतने कम विस्तार में इतना घना सौन्दर्य | फिर भी कही कुछ कम नही , कही कुछ ज्यादा नही ; जैसे तोल कर प्रकृति ने रख दिया है | कुछ घटाया -- बढाया नही जा सकता , कुछ बदला नही जा सकता |

बागीचा भी इमारत का एक अंश था | इसके वास्तु के प्रभाव को सरो के वृक्ष निरंतर बढाये थे | सामने उपर एक चबूतरा है , नीचे दुसरा | एक के फैले मैदान में फूलो का बाग़ कधा है , दुसरे पर ताज की मीनारे है | उनके बीच ताज ऐसा लगता है जैसे चार लम्बी सहेलियों के बीच सुघड़ शाहजादी | दर्शक ठग जाता है |
दोनों और मस्जिदे खड़ी है लाल पत्थर की | खुशनुमा चित्रित ताज का सारा आकार जनाना है , उसके खम -- तेवर जनाने है | बुनियाद से उंचाई तक सारा कलेवर जनाना है | जैसे वह स्वय मुमताज महल हो , ईरानी साहबजादी , कोमल , सुकुमार , अल्हड | किसी ने उसे ' संगमरमर की आकृति में स्वपन ' कहा है , किसी ने ' फरिश्ते का जाहिर अफसाना ' | कुछ भी कहा जा सकता है , और जो कुछ खा जाएगा वह सारा सही होगा | कयोकि उस कला की परिभाषा कठिन है , उसका विश्लेषण असम्भव जो ताज में मूर्तिमान हो उठा है |
ताज जो सामने है कुछ ऐसा है जो अजब है | देखने वाले की नजरे ' फोकस ' कर लेता है | देखने वाला कहता है -- काश आँखों को जबान होती और जबान को आँखे ! और देखने वाला कही इतिहास का विद्यार्थी हुआ तो वह ताज की बुर्जियो के पीछे देखता है , उसकी बुनियाद के पहले | उसके निर्माण के पहले |

सामने उस इतिहास के विद्यार्थी के ताज है उसका मध्यवर्ती गुम्बज है उसकी पाशर्वव्रती मीनारे है , नाजुक बुर्जियो और उनके पीछे एक दुनिया है | दुनिया , पृष्ठभूमि के आकाश की नही , जमुना से उठते कुहासे की नही ; दुनिया दुःख -- दर्द की जो अब बीत चुकी है , मर चुकी है , पर जो कभी ज़िंदा थी , जिसने इस ताज का निर्माण किया था , इसका अनुपम आकर्षण अभिसृष्ट किया था |
उन बुर्जियो के पीछे है वह दुनिया जिसकी कराह मात्र अब ताज की मध्यवर्ती समाधियो में गर्भगृह के ताबूतो के उपर उठती है और छत से टकरा -- टकरा कर गूंजती है , फिर धीरे -- धीरे भीतर हवा के साथ बाहर निकल जाती है बुर्जियो की ऊँचाई के उपर उठ जाती है , गुम्बज के चतुर्दिक मडरा -- मडरा कर एक उफ़ करती है , उस पर छा जाती है |

पर ऐसा क्यों ? इतिहास का विद्यार्थी सोचता है , गुनता है और फिर बुर्जियो के पीछे इतिहास के विगत चित्रों को देखने लग जाता है | ताज मुहब्बत का मूर्तिमान कलेवर है , भाव बन्धन प्रेम का प्रतीक , शाहजहा और मुमताज महल के सुकुमार प्रणय का सम्मोहक स्थापत्य अवतरण | उसकी विचार धाराए उसे पीछे लौटा ले जाती है स्माधिग्रिः में जहा दो आत्माए सोयी हुई है , जिनके
मरणान्तर आवास के हित दुनिया का यह अचरज खड़ा किया गया |
शाहजहा के लिए नही , मुमताज महल के लिए , आर्जुमन्द बानू बेगम के लिए | आर्जुमन्द बानू बेगम | एत्मादुददौला की पोती आसफ खा की इकलौती बेटी , नुरजहा की भतीजी |विद्यार्थी के सामने से ताज , उसकी बुर्जिया , उसकी मस्जिदे , उसके मेहराबी दरवाजे हटते जा रहे है | उसकी आँखों के सामने एक नयी , पर जी कर मरी हुई दुनिया उठ रही है ----

आर्जुमन्द बनू बेगम | अमीरजादा बिगड़ा ग्यास बेग | उसके ईरानी प्रासाद के टूटे कगूर , उसके बागीचे की गुलाबभरी क्यारिया , उसके प्यालो के दौर , जुए की झंकार | काफिले के साथ मजबूर होकर हिन्दुस्तान में किस्मत आजमाने आगरे की और बियाबा की मुसाफिरी | और बियाबा में मेहरुन्निसा का जन्म , नूरमहल , नुरजहा का जन्म |
फिर आगरे में अकबर की फैयाजी | दरबार में पनाह | बाप - बेटे को खिलअत | हुमायु ने कभी ईरानी दरबार में पनाह ली थी | उपकृत बेटे में ईरान के भिखमंगे को भी शाह बना देने का अरमान था | दर -- दर का भिखारी ग्यास जहागीर की हुकूमत में जब मेहरुन्निसा '' नूरमहल '' हो गयी
एत्मादुददौला बना वजीर आजम वह नूरमहल का पिता था और उसका पुत्र , नूरमहल का भई , आसफ मनसबदार | आर्जुमन्द बनू बेगम उसी आसफ की बेटी थी , एत्मादुददौला की पोती | विद्यार्थी इतिहास के स्वत: खुलते पन्नो पर निगाह गडा देता है ----
खुर्रम -- वही शाहजहा , मुमताज महल का प्रणयी और पति | खुर्रम -- जहागीर का तीसरा बेटा , दिल्ली की सल्तनत का तीसरा हकदार | खुर्रम जो शाहजहा होने के पहले भी शानो - शौकत का पर्याय था , जीकी ऊंचाई सर टामसरो को कभी गौरव और मर्यादा की ऊंचाई लगी थी ; वही खुर्रम जो अपने सख्ती , गम्भीरता , तेजी के कारन बाप के दरबार की भडैती के बीच अकेला , सर्वथा एकाकी , पर भय का स्थान जन पड़ता था , वही जो बाप के इसरार पर शराब की एकाध घुट जब -- तब पी लेता पर जिससे वह उसके सामने तोबा करने से नही चुकता था |
खुर्रम -- जिसकी तलवार एक बार हेरात में चमकी थी , फिर बलख में , फिर दक्कन और बंगाल में फिर बलख में |
विद्यार्थी के सामने ताज का धूमिल धुधला आकर तक नही | उसकी लेने कब की निराकार हो चुकी है | उनके स्थान पर एक श्वेत पट खड़ा है जिस पर रंग बिरंगे चित्र , वफादारी के चमकते नमूने एहसान फरामोशी के काले कारनामे , औदार्य और क्रूरता के अभिराम अंकन एक के बाद एक चले जा रहे है ---

खुर्रम के अतिरिक्त पिता के तीन पुत्र थे -- खुसरू , परवेज , सहरयार | खुसरू ने बाप से बगावत की , कैद कर लिया गया | खुर्रम ने उसे चुपचाप दूसरी दुनिया में भेज दिया | यह नम्बर एक था ; अभि दो और थे , एक राह का काटा दूसरा संभावित शत्रु |
कुछ ही साल बाद परवेज भी मर गया | कैसे , यह कौन जाने ? खुर्रम अब इस दुनिया में नही जो इस मौत पर प्रकाश डाले | खुर्रम ने शादी कर ली , फिर | यह दूसरी शादी थी | एतमादुददौला की पोती से , वजीर आसफ की बेटी आर्जुमन्द बानू बेगम से |
सहरयार नुरजहा का दामाद था | नुरजहा जहागीर की पत्नी थी , उसकी स्वामिनी , सल्तनत की वास्तविक जिम्मेदार और मलिका | सहरयार उसका दामाद था | खुर्रम ने सहरयार को देखा , नुरजहा को , बाप को देखा और करणीय स्थिर कर लिया | बगावत का झंडा खड़ा कर उसने बाप से लोहा लिया | फिर असफल हो दक्कन भगा , मलिक अम्बर की शरण में | पर वहा वह रुक न सका | बंगाल -- बिहार की और जा पहुचा , दोनों पर उसने कब्जा कर लिया | फिर शाही फ़ौज की मार खा वह फिर भागा |
और एकाएक वह जहागीर -- नुरजहा दोनों को कैद कर खुद गद्दी पर जा बैठा |
सहरयार को उसने तलवार के घाट उतार दिया | बाप अपने आप खुदा की राह लगा | अब उसने अपनी सल्तनत की माप - तौल शुरू की | तेरह साल के बाबर ने फरगना के मैदानों में किस्मत से लोहा लिया था | तेरह साल के अकबर ने पानीपत के मैदान में अपनी किस्मत आजमाई थी | दोनों के ताप और त्याग ने दिल्ली -- आगरे का क्षितिज - चुम्बी साम्राज्य खड़ा किया था | जहागीर ने उसे नशे के धुएं में देखा था | पर शाहजहा ने निश्चय किया , वह उसे भोगेगा |
दिल्ली किले के दीवाने आम और ख़ास , जमा मस्जिद , आगरे की मोती मस्जिद -- एक - एक कर खड़े हुए एक से एक आला , एक से एक कीमती जिन्हें जिन्नात ने बनाया , शाहजहा की दरियादिली के सबूत में , उसकी ख्याल बुलंदी की यादगार में | फिर तख़्त टॉस बना , ठोस सोने का जिसके पाए पन्नो के मोरो के थे , किनारे नीलम के जमीन नक्काशीदार वैदूर्य की थी | करोड़ो लगे इनमे पर इसकी शाहजहा को क्या परवाह थी , करोड़ो प्रान्तों से आते थे , अहमदनगर उसके सरहद के युद्दो में लग गये थे | बीस करोड़ | और ये करोड़ प्रान्तों से आते थे |, अहमदनगर से , गोलकुंडा से , बीजापुर से | दूर -- पास के सौदागर व्यापार के जादू से सल्तनत की राजधानी में धन बरसाते थे , फिरंगी अपनी भेटो से दौलत की मीनार खड़ी करते थे , दूर पास के किसान अपने पसीने की कमाई अपनी रक्षा के बदले अपने बादशाह को देते थे |
रक्षा के बदले | निश्चय उस रक्षा के बदले जिसमे मुगलों की उत्तर दक्खिन दौड़ती फौजों के घोड़ो की खुराक भी शामिल थे , मराठो की चौथ भी जातो की लुट भी | पर इससे शाजहा को क्या करना था ? शाहजहा फैयाज था ; कहते है , दयावान भी था | तभी तो उसने भयंकर अकाल में ढेढ़ लाख रूपये प्रजा के लिए अन्न पर खर्च किये थे -- उस भयंकर अकाल में ढेढ़ लाख का खर्च जिसमे सदके लाशो से पट गयी थी , बेटे ने माँ को खाया था , माँ ने बाप को |
ढेढ़ लाख , जब नुरजहा को शाहजहा पच्चीस लाख सालाना खर्च के लिए देता था , अठ्ठासी लाख वह अपने गुलामो पर खर्चता था , तेरह लाख अपनी पोशाक पर और जब केवल अपने तख़्त -- ताउस बनाने वाले फ्रेंच सुनार -- मिस्त्री उसिन बोडो को पन्द्रह लाख उसने इनाम में दे दिए थे |
इस शानो शौकत के बादशाह ने उस ईरानी हर को व्यहा था जिसका नाम आर्जुमन्द बानू बेगम था | व वह उसके तेरह बच्चो की माँ बनी और चौदहवे के प्रसव में उसने अपनी जान खोयी | १६३३ का साल था || शाहजहा जहा लोदी के विरुद्द अपनी सेना लिए दक्कन की चढाई पर गया हुआ था | शाहजहा कभी मुमताज को अपनी नजरो से दूर न्क्र्ता | वह भी उसके साथ द्द्क्कन गयी हुई थी | बुरहानपुर में मलिका ने शाहजहा की गोद में दम तोड़ दिया |
शाहजहा पर जैसे वज्र टूट गया | मुमताज के साथ बीस बरस के अपने वैवाहिक जेवण में उसने कभी विछोह जाना ही नही था | उसे गुमान भी न था कि उसे कभी अपनी प्रेयसी से अलग होना पड़ेगा | दिन रात के साथ ने कुछ ऐसा विश्वास दिला दिया था कि जैसे उसे कभी उसे अलग नही होना है |
पर अब उसकी आँखों के सामने आसमान घूम गया | हफ्तों उसने किसी वजीर तक को अपने पास न आने दिया | खाना पीना छुट गया , गद्दी तक छोड़ देने की ख्वाहिश उसने जाहिर की | दरबार ने दो साल मातम न्माया | नाच - रंग , गाना - बजाना , उत्सव - समारोह सब बंद हो गये | जेवर - जवाहारात , इतर इत्यादि सब कुछ विसर्जित कर दिए गये | मुमताज जीकाद के महीने में मरी थी | जीकाद का महीना सदा के लिए मातम का महीन करार दिया गया | महरूम की लाश आगरे के ताज के ब्घिचे में तब तक रखी गयी जब तक रखी गयी जब तक कि वह इमारत तैयार न हो गयी जिसके लिए शाहजहा ने अपने दिल में जगह कर ली थी |
मलका के दफनाने के लिए ऐसा मकबरा बनना था जो दुनिया में लामिसाल हो जिसे देख फरिश्ते हैरत में अ जाए | इंजीनियरों की कमी न थी | अकबर के ही जमाने से आगरे के दरबार में दूर - दूर के इंजीनियरों की भीड़ लगी रहती थी -- हिन्दुस्तान , ईरान के , ईराक , आर्मीनिया के , मध्य एशिया के |
शाहजह ने '' माडल '' मांगे | दुनिया में सबसे सुन्दर बनने वाली इमारत के लासानी मकबरे के माडल आये -- चीन से , मंगोलिया से , समरकंद -- फरगना से , ईरान - खुरासान से , ईराक -- आर्मीनिया से , काहिरा - अल्ह्म्रा से , वेनिस - वर्साई से , कुस्तुन्तुनिया -- बाईजेनित्यम से |

एक से एक माडल आये , इतने कि दीवाने खास भर गया , ऐसे कि आख नही ठहरती , चुनना मुश्किल हो गया | शाहजहा खुद हैरत में था , उसके इंजिनियर दांग थे | कैसे क्या चुने ?

योरप का सबसे चतुर कलावन्त वेनिस का गेरोनियो विश्वकर्मा को भी अचरज में दाल देने वाला अपना माडल लिए जमा था | उधर बाईजेनिय्म का तुर्क शिराज का उस्ताद ईसा अपनी उज्जवल मुकताध्वल कारीगरी लिए चुप बैठा था , उस अंधे कारीगर के पास जिसकी सलाह से वह अदभुत नमूना तैयार हुआ था | और शाहजहा की आँखे दोनों पर -- वेरोनियो से ईसा पर , ईसा से वेरोनियो पर -- लगातार फिर रही थी | उस्ताद ईसा का शिराजी नमूना शाहजहा को जम गया | उसकी सादगी ने उसे मोह लिया | शाहजहा ने अपने मुख्य स्थपित से कहा -- दुनिया में जहा कही राज और कारीगर हो बुला लो , हर अपने फन में उस्ताद हो | फिर खजांची को बुलाकर उसने कहा -- इस नायाब इमारत के लिए खजाने के किमिति से कीमती जवाहरात हाजिर करो | दुनिया में जो रतन , जो कीमती पथ्थर काम का हो , माँगा लो , कीमत की प्रवाह न करो | दौलत बेशुमार शाही खजाने में पड़ी है , कमी हो तो सल्तनत के सुबो से वसूल करो | दोनों ने सिर झुका लिए , दोनों हुकम की तामिल में लगे |
मुख्य स्थपित अपने कम में लगा | स्थपतियो की कौंसिल प्लान को समझने लगी | संसार की सुन्दरतम इमारतो की ड्राइंग उस प्लान में दाखिल हुई | हिन्दुस्तान के कलावन्त , फारस के रंगसाज , अर्ब के संगतराश , आर्मीनिया के पच्चीकार , कुस्तुन्तुनिया के गुमब्जकार , वेनिस के सुनार आगरे में आ जमे | पर शाहजहा संतुष्ट न हुआ | उसने फिर हुकम जारी किया -----
बगदाद , देहली , और मुल्तान से राज बुलाओ , एशियाई , तुर्की और समरकंद से गुमब्जकार . कन्नौज -- बगदाद से पच्चीकार बुलाओ , शिराज से हरूफ नक्काश | हुकम की देर थी | आ गये बगदाद , देहली और मुल्तान से राज , एशियाई , तुर्की और समरकंद से गुमब्जकार , कन्नौज -- बगदाद से पच्चीकार शिराज से हरूफ नक्काश | सल्तनत का खजांची भी हुकम की तामिल में लगा | हिन्दुस्तान और मध्य एशिया से कीमती पत्थर मगाने में उसने पानी की तरह तैमूरिया खजाने का धन भाया | जयपुर से संगमरमर आया , सिकरी से संग्सुख , पंजाब से सूर्यकांत | चीन से जमरूद और स्फटिक आये तिब्बत से नीलमणि अर्ब से मूंगा और संगमुसा | पन्ना से हीरे आये , ईरान से बिल्लौर और याकुत , शहर पूजां से गोमेद | अब जगह चाहिए थी , तातारीउसूलो के अनुकूल जगह -- जहा रवा आब हो , जिन्दगी का प्रतीक फूलो का बाग़ हो मौत का प्रतीक सरो का साया हो , जमीन जिसकी लुटी - चुराई हुई न हो | जमीन अम्बर के राजा जै सिंह ने दी , शाही जमीन के बदले ; वह जमुना का रवा पानी था , फूलो का बाग़ था , सरो का साया था |

इतिहास का विद्यार्थी देख रहा है -- बुर्जियो के पीछे , जमुना के किनारे उठती हुई ताज की इमारत को और सुन रहा है संगतराशो की खटखट , छेनी की चोट , और दूर - पास से आती हुई एक कराह जो संगतराशो की खटखट , छेनी की चोट पर छा जाती है , उनमे घुलमिल जाती है |
वह देख रहा है उस आलम को जो शाहजहा का स्वपन सच्चा कर रहा है , जिसमे हिन्दुस्तान के क्ल्वांत , फारस के रंगसाज , अर्ब के संगतराश , आर्मीनिया के पच्चीकार , कुस्तुन्तुनिया के गुमब्जकार , वेनिस के सुनार लगे है , फर बगदाद , देहली और मुल्तान के राज लगे है एशियाई , तुर्की और समरकंद के गुमब्जकार , कन्नौज -- बगदाद के पच्चीकार लगे है , शिराज के हरूफ नक्काश और उनके इशारो पर दौड़ने वाले , मोटे काम करने वाले बीस हजार मजूर | ताज की नीव पद गयी है उसका आकार उठ चला है |

ताज का निर्माण कुछ मजाक नही | तैमूरिया सल्तनत के सारे साधन , हिन्दुस्तान की जनता की समूची प्रतिभा , उसका कुल ' जीनियस ' उसके निर्माण में लगा | जनता ने पहले भी बहुत कुछ दिया था -- सरहदी लड़ाइयो के लिए धन , तख़्त ताउस के लिए दौलत | सब कुछ दे सकती है |

पहले शाहजहानाबाद , फिर दरबारे आम और ख़ास , फिर जामा मस्जिद , फिर मोती मस्जिद और अब ताज , सारा देश एक सांस से ताज के लिए काम कर रहा था | किसान उसी के लिए खेत जोत रहा था , फसल काट रहा था , काफिर , पंडित उसी की निर्विघन समाप्ति के लिए पूजा कर रहा था , सौदागर उसी के लिए व्यापार कर रहा था | सूबेदार किसानो से जूझ रहे थे | दोनों में होड़ लगी थी , सुबेदारी पलटन की क्रूरता में और किसानो के बर्दाश्त और पसीने में |

आसाम से गिरनार तक , काबुल से गोलकुंडा तक -- सारा देश ताज के ही नाम सोता , ताज के ही नाम जागता था | दौलताबाद और दक्कन , गुजरात और मालवा , बंगाल और बिहार , सिंध और पंजाब , काबुल और कश्मीर से दिल्ली आने वाली सदके निरंतर श्रृखलाबद्द खजाना लदी गाडियों से भरी रहती |

एक कतार गाडियों से दूसरी कतार मजदूरों से | रोज बीस हजार मजदूर लगते थे |
ताज के निर्माण की अवधि बीस वर्ष कुतीगयी थी | बीस वर्ष , बीस हजार मजदूर , तीस करोड़ रूपये | बीस हजार मजदूर बैस वर्ष तक -- कम से कम दो पिधिया | फ़ौज का सिपाही कमजोर हो सकता था , उसके कमजोर होने से कम चल सकता था पर मजदूर कमजोर नही हो सकता था | उसे बदन की ताकत भरपूर खर्च करनी थी | पत्थर की चट्टाने उसे उठानी थी , हाँ चट्टाने और दूर तक , चट्टाने चाहे संगमरमर की ही क्यों न हो , उनकी नसे चाहे ही क्यों न हो , है तो वे चट्टाने ही ; उन्ही चट्टानों को इन मजदूरों को उठाना है |
बैस वर्ष तक बीस हजार नित्य | दो पिधिया , एक -- एक पीढ़ी के दस - दस वर्ष -- आयु के सुन्दरतम , शक्तिमय वर्ष , पच्चीस से पैतीस वर्ष तक की आयु -- जब एक - एक पीढ़ी का एक - एक मजदूर अपने परिवार के उस काफिले को खिलाने के लिए पूरा न्पद्ता जो वावजूद उसके गिडगिडाने के भगवान छप्पर फाड़ कर दिए ही जाता था |
मजदूर -- दूर काठियावाड़ के मजदूर , अहमदनगर - गोडवाना के मजदूर बंगाल - बिहार के मजदूर , गुजरात - सिंध के मजदूर काबुल -- पंजाब के मजदूर गंगा -- जमुना पार के मजदूर | मुफ्त -- बेगार मजदूर उपर दूर तक चट्टान चढाने वाले चढाते -- चढाते गिर कर मर जाने वाले मजदूर , गोर गेहुए , काले मजदूर - गरज कि सारा हिन्दुस्तान |

ताज की इमारत उठती चली आ रही थी , खुशनुमा फूलो के बाग़ में प्रशांत सरो की सेवा में , रवा दरिया के किनारे | उठती आ रही थी इमारत हाथो हाथ उठती मजदूरों पर कोड़े बरस रहे थे , राजपुरुष इधर - उधर कोड़े फटकारते घूम रहे थे और हाथोहाथ सम्मिलित शक्ति से जैसे पत्थरों की श्रृखला बंध जाती थी , नीचे से उपर तक | गोर -- गेहुए - काले हाथ ! क्यों न लगे ये गोर -- गेहुए - काले हाथ कही और -- क्या न कर सकते थे ये हाथ एक साथ ?
मजदूरों की तीन - तीन रिजर्व पार्टिया थी -- बराबर नयी होने वाली दस - दस हजार की | बीस हजार से कई गुनी संख्या जयसिंह के उस आरामगाह में पड़ी रहती थके हुओ को फुर्सत देने के लिए | और जमुना पार से बेगारो की जमात . रोज आती रहती चीखते , -- बिलखते मजदूरों की जमात साथ ही बीबी से बिछुड़े , माँ अकेली बेसहारे , बच्चो की उम्मीद !
इमारत का धड खड़ा हो गया | कंधे नगे खड़े है -- इतिहास का विद्यार्थी देखता है -- मस्तक अभि गायब है बनना है | एशियाई , तुर्की और समरकंद के गुम्ब्जकर अपनी कारगुजारी दिखा रहे है हाथ की सफाई | उन्हें हजरत अली के मजार शरीफ के मकबरे का गुम्बज सर करना है , समरकंद में गुर अमीर वाली तैमूरी कब्र का गोलाम्बर जितना है , इस्फ़हानी मस्जिदेशाही का गुम्बज झुका देना है | वे अपने कम पर लट्टू की तरह नाच रहे है | ताज उठता आ रहा है |

ताज उठता आ रहा है | पर अब इमारत का ताज बन रहा है , मकबरे का मस्तक |
और उसका बनना आसान नही | मामूली दाख की बेल के लिए खून की जरूरत होती है , दाख की बेल जो साल में बस एक बार आती है | इसे सदियों खड़े रहना है , धूप में , बरसात में , आँधी और बवंडर में | बड़े बलिदानों की इसे जरूरत होगी |
पर बलिदान के पशु तैयार है | मजदूरों की तादाद रोज बढाई जा रही है | बलिदान सदा अपनी इच्छा से नही होते | यदि अपनी इच्छा से ही सदा बलिदान होते तो मिस्र के पिरामिड कैसे बनते , दजला -- फरात के जग्गुरत कैसे खड़े होते , चीन की दीवार कैसे दौड़ती , रोम का कोलोसिस्यम कैसे बनता ? सारे बलिदान बलि - पशु की इच्छा से ही नही होते | बलि -- पशु की इच्छा से कौन बलिदान होते है ?
पर जो हो , बलिदान की आवश्यकता यहाँ है -- इतिहास का विद्यार्थी साफ़ -- साफ़ देखता है -- शाहजहा -- मुमताज की मुहब्बत की बेल -- ताज का मकबरा -- चढानी है | उसकी जड़ में जब इंसान का गरम खून रसेगा तब कही यह इमारत सदियों टिकेगी | बेजबान मजदूर अपने बादशाह की इस नन्ही मांग को नही ठुकरा सकते |
गुम्बज बनने लगा | ढोके लेकर कइयो को एक साथ चढना है , चढना होगा उस गोल कटाव के पास तक पतली सीढ़ी के सहारे | और इतिहास का विद्यार्थी देख रहा है ----------- पतली सीढ़ी के सहारे | और यह हड - हड आवाज भी सुनता है | हड - हड -- तड़ - तड़ | कहा गये ये मजदूर ? चट्टाने तो ये है , ढोके वहा जा गिरे है , चाहे संगमरमर के ढोके -- पर मजदूर कहा है जिन्होंने इन्हें सीढ़ी की उस पतली आसमानी राह पर उठाया था ? पूछता है इतिहास का विद्यार्थी और जब वह नही कुछ देख पाता , सुनता निश्चय है एक आवाज पर अकेली आवाज नही , मिली -- जुली अनेको की एक साथ -- एक चीत्कार , चीख -- पुकार जो गिरी चट्टानों की धमक की बार -- बार उठती गूंज को दबा देती है , ताज के अधबने मस्तक पर छा जाती है !
पर चट्टानों का चढना नही रुक सकता क्योकि गुम्बज का बनना नही रुक सकता , क्योकि ताज का बनना नही रुक सकता , क्योकि शाहजहा -- मुमताज की मुहब्बत का मान यह मकबरा बन कर ही रहेगा , क्योकि सारी सल्तनत के साधन , सारे देश के ''जीनियस '' इसके निर्माण में लगे है , क्योकि ये बेजबान हजारो मील दूर से जो आये है , लाये गये है , इनका क्या होगा ?

देख रहा है वह विद्यार्थी मजदूरों का बार -- बार गुम्बज की ओर पतली राह से चट्टानों को लेकर चढना इनका उलट कर गायब हो जाना , फिर सुनता है चट्टानों की धमक और गूंज , फिर अनजानी भयावनी आवाज का -- चीख -- चीत्कार -- उच्छ्वास का -- उठना , चट्टानों की गूंज को दबा देना , उपर गुम्बज पर छा जाना फिर और फिर | और दूर के काठियावाड़ -- मालवा में गोलकुंडा - गोडवाना में , बंगाल -- बिहार में , काबुल - पंजाब में और पास के दिल्ली -- आगरे के गाँवों में झोपड़ो सायबानो की देहली में खड़े माँ - बाप , बीबी बच्चे राह देख रहे है थकी उम्मीदों के सहारे लम्बे इन्तजार से लडखडाते पैर | और उन्हें पता नही उन कोड़ो का चट्टानों के उठने - गिरने का उन प्रेतों की सेना की उठती -- फैलती आवाज का , जो गिरती चट्टानों की धमक की गूंज को दबा देती है , उठते गुम्बज पर छा जाती है |
और इतिहास का वह बेहया विद्यार्थी अभी सुनता ही जाता है यद्यपि कभी वह कानो पर हाथ फेरता है कभी मुँह पर कभी आँखों पर | और गुम्बज उठता ही आता है | उधर प्रधान स्थपति मशगुल है , नितांत व्यस्त | नीचे मजार की छत बन रही है पच्चीकारी में कीमती पत्थर जड़े जा रहे है , देश - विदेश के | मजार की जाली सोने की है जवाहारात जड़ी | और ये चांदी के उसके दरवाजे है जिनमे कीमती पत्थर लगे है जिन्हें फ्रेंच सुनार आसीन द बोर्दो ने तैयार किया है , बोर्दो जिसने तख़्त ताऊस बनाकर पन्द्रह लाख पाए थे |
खजांची भी अपनी खरीदारी में व्यस्त है | फारस के गलीचे वह खरीद रहा है , सोने के चिराग , कीमती शमाहजार और मजार को ढकने के लिए मोतियों की चादर लाखो फेंक रहा है वह | देश की सारी ताकत लगाये हुए है , रूपये फेंकता जा रहा है पर लाश अभी दफनाई नही जा सकती -- वह चट्टानों की धमक है छेनियो की खट - खट है और उससे बढ़कर उन बुर्जियो का बनना अभी बाकी है जो गुम्बज से कही ऊँची जायेगी , जो उससे कही पतली होगी जिनकी राह कही अधिक संकरी होगी , जो शहजादी के चारो ओर लम्बी सहेलियों - सी खड़ी होगी |
फिर वही शोरेमातंम | बुर्जिया बन रही है , जाने चीख रही है | इतिहास का विद्यार्थी देख -- सुन रहा है | बुर्जिया बन चली , गिरती चट्टानों से गिरती चट्टानों के उपर चढ़ चली , दबी -- चीखती जानो के उपर |

अब समझ पाया वह इतिहास का विद्यार्थी '' आहिस्ता बोलो '' का राज '' धीरे दस्तक ' देने का मतलब | श्मशान की शान्ति में आर्जुमन्द बानू बेगम की मजार की रहस्यमय चुप्पी की पुकार अब वह सुनता और समझता है | उसकी सांय - साय में जो एक बोझिल आवाज उठती है , वह जानता है है , उन भूतो की है जो अपनी मौत से नही मरे , जो कयामत के रोज भी न उठेगे , जो गुम्बज और बुर्जियो से गिर कर बगैर दफनाये दरगोर हो गये , जिनकी चीख इमारत की ईट -- ईट से निकल रही है |
वह भागता है , उस समाधि -- गृह से , मजार की चुप्पी से जहा हजारो भूतो की आवाजे हवा में घुली - मिली थी , उन भूतो की जिनके मरने पर उन्हें न किसी ने तेल - इत्र लगाया , न किसी ने कफन ओढाया -- जो ऊँचे आसमान से गिर कर नीव में दब गये थे |

वह फिर कर देखता है , भागता है , फिर देखता है ताज की ओर , उसकी गुम्बज और बुर्जियो की ओर - और ! सोचता है -- क्यों नही ! यह निश्चय प्रतीक है इमारत ! पर शाहजहा और मुमताज की मुहब्बत की नही , बल्कि देश की एकत्र प्रतिभा की , किसानो के उस पसीने की जिनका उल्लेख्य किसी इतिहास में नही |
और वह बुर्जियो को जो देखता है तो उसे कुछ नही दिखता , न बुर्जियो , न गुम्बज , न इमारत पर उनकी जगह पर छायी -- छायी वह दर्द भरी आवाज सुनता है जिससे समाधि -- गृह का वातावरण क्षुब्द था , हवा बोझिल थी और जो अब उपर उठकर आसमान में छायी हुई है , जो उन भूतो की है जो सदा के लिए सो गये है , जो कभी न उठेगे , कयामत के रोज भी नही |

और दूर के काठियावाड़ -- मालवा में गोलकुंडा -- गोडवाना में बंगाल -- बिहार में और पास के दिल्ली -- आगरे के गाँवों में झोपड़ो , सायबानो की देहली में खड़े माँ -- बाप , बीबी - बच्चे राह देख रहे है थकी उम्मीदों के आसरे , लम्बी इन्तजार से लडखडाते पैरो -- उनके लिए जो सदा के लिए सो गये है , जो कभी न उठेगे , कयामत के रोज भी नही |

सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार आभार - बुर्जियो के पीछे लेखक - भगवत शरण उपाध्याय

छापेखाने (प्रेस) के अविष्कारक --- -विलियम कैकसटन

आज से सात -- आठ सौ वर्ष पहले बहुत कम लोग पढ़े - लिखे होते थे | लोग पढ़ते कैसे ? पुस्तके ही नही थी | थोड़ी -- बहुत पुस्तके जो थी वे बहुत महँगी थी , कयोकि वे हाथ से लिखी जाती थी | एक पुस्तक लिखने में महीनों लगते | फिर यह पुस्तक कोई धनी आदमी खरीद लेता |

प्राचीन काल में कागज और कलम भी नही होते थे | लोग  राजहंस या बत्तख के पखो से कलम बनाते और भेड़ की खाल को साफ कर के उससे  कागज का काम लेते ,  , फिर अपने मनपसन्द रंग से उस पर लिखते | यदि  छापाखाना  ( प्रेस ) का आविष्कार न हुआ होता , तो आज प्रत्येक पुस्तक  दूसरी पुस्तक से भिन्न होती | फिर पुस्तके  इतनी बड़ी संख्या में बाजार में कहा से मिलती ? हम पर यह बड़ा उपकार किसने किया विलियम कैक्सटन ने |

विलियम कैक्सटन इंग्लैण्ड में पैदा हुए थे | उन दिनों में शिक्षा बहुत कम थी | फिर भी विलियम के पिता ने उन्हें घर पर थोड़ा -- बहुत पढ़ा लिखा दिया | विलियम कुछ सयाने हुए तो उनके पिता ने उन्हें लन्दन के एक व्यापारी के पास नौकर रखवा दिया | विलियम के पिता चाहते थे कि उनका बेटा व्यापार करना सीखे | जिस व्यापारी  के पास विलियम काम सिखने गया उनकी कम्पनी में लन्दन के कई अन्य व्यापारी भी शामिल थे | ये व्यापारी रेशम और ऊनि कपड़े खरीदते -- बेचते थे | विलियम थोड़े ही समय में कपड़े के व्यवसाय के गुर जान गये | उन्हें कपड़े की पूरी -- पूरी पहचान हो गयी | कपड़े के रंगों को देखते ही विलियम बता देते थे कि ये रंग कच्चे है या पक्के | कपड़ा अच्छा है या खराब |
उन दिनों लन्दन में व्यापारियों के सभाए भी होती थी | व्यापारी लोग अपने सामान का प्रचार करने के लिए इकठ्ठे होकर बाजारों में घूमते थे | विलियम की कम्पनी भी शहर में जलूस निकालती | उस समय विलियम अपने स्वामियों के पीछे -- पीछे जलूस में शामिल होते | सब व्यापारी गीत  और कविता पढ़ते हुए बाजार से गुजरते | विलियम बीस वर्ष के थे कि कम्पनी का स्वामी मर गया | विलियम को उनकी मौत का बड़ा दुःख हुआ | अब विलियम को घर से दूर वेल्जियम के नगर बुरोजज में भेज दिया गया | वहा  वह एक बड़े मकान में रहने लगे | विलियम  को शायद यह मकान पसंद न आता, लेकिन उस मकान में सभी अंग्रेज रहते थे | विलियम को विदेश में अपने देश के लोग मिल गये तो वह स्वदेश से दूर होने का दुःख भूल गये | वह बहुत जल्दी सब लोगो से घुल - मिल गये | विलियम बहुत ही समझदार थे | प्रत्येक का हमदर्द भी था | इसीलिए उस मकान में रहने वाले अंग्रेज ने उन्हें मकान का मैनेजर बना दिया | अब मकान की देखभाल , लोगो के खाने - पीने और मनोरंजन आदि सब का प्रबंध विलियम के हाथ में था | अंग्रेजो के आपस में झगड़े होते तो विलियम ही उनमे सुलह - सफाई करवाते | उन्हें जब फुर्सत मिलती , तो पुस्तके ढूढने निकलते और घर लाकर रात - रात  भर पढ़ते रहते | विलियम जब वहा  से जर्मनी  गये तो वह वहा  के कई धनी आदमियों से मिले | इन मुलाकातों में विलियम ने इन धनी लोगो के पास पुस्तके देखी  | ये पुस्तके चमड़े पर हाथ से लिखी हुई थी  | लिखने वालो ने बड़े सुन्दर रंग का उपयोग किया था | इन पुस्तको में हाथ से बनी हुई तस्वीरे भी थी | विलियम को फ्रांससी भाषा में लिखी हुई एक पुस्तक मिल गयी | उन्हें यह पुस्तक इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने पुस्तक का अंग्रेजी  में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया और अपनी पुस्तक का नाम '' ट्राय का इतिहास '' रख दिया | पुस्तक बहुत बड़ी थी | विलियम ने उसे नकल और अनुवाद करने में दिन - रात एक कर दिए | वह काफी समय तक अनुवाद में लगे रहे | आखिर उनकी नजर कमजोर हो गयी | उनकी आँखों से हर समय पानी बहने लगा | हाथ से बिलकुल  शिथिल हो गये | उन्होंने विवश होकर अनुवाद बंद कर दिया लेकिन उसी दिन से सोचने लगे कि कोई ऐसा तरीका होना चाहिए जिससे पुस्तक आसानी से नकल हो जाए और साथ ही बहुत सी पुस्तके एक साथ तैयार हो जाए | जर्मनी और हालैंड में घूमते हुए विलियम को पता चला कि कई लोग लकड़ी को खोदकर उसमे कुछ अक्षर उभार  लेते है | उभरे हुए अक्षरों पर रंग लगा देते है और फिर कागज चिपका कर उसका प्रतिबिम्ब उतार लेते है | इस प्रकार आक्ग्ज पर उभरे हुए अक्षर नकल हो जाते है | विलियम बुरोजज वापस आये , तो किसी ऐसे आदमी को ढूढने लगे , जो लकड़ी पर अक्षर बनाना जानता हो | उन्हें एक दुकानदार मिल गया | विलियम ने बूढ़े आदमी को समझाया कि भई लकड़ी के अक्षर बनाना ठीक नही है , कयोकि लकड़ी फट जाती है और अक्षर बेकार हो जाते है | विलियम ने उसे सलाह दी कि लकड़ी के बजाए धातु के छोटे - छोटे अक्षर बनाये | फिर एक चौखटा तैयार किया | विलियम उस चौखटे में सभी अक्षर इकठ्ठे करके कस  देते | अक्षर पर स्याही लगाते और कागज चिपका -- चिपकाकर उतर लेते | इस प्रकार शब्द कागज पर बिल्कुल  साफ छप जाते | विलियम ने यह आविष्कार पूरा कर लिया तो अपना छापाखाना ( प्रेस ) लेकर अपने देश वापस आ गये | लन्दन आते ही विलियम ने एक दुकान में छापाखाना लगा दिया दुकान के बाहर छापेखाने का बोर्ड  लगाया | सारे  संसार में यह सबसे पहला छापाखाना था | लोग हैरान थे | लन्दन में रहने वाले भाग  -- भाग कर छपाई का तमाशा देखने के लिए विलियम की दुकान पर आते | विलियम के छापेखाने की हर और धूम मच गयी | यहाँ तक कि इंग्लैण्ड  का सम्राट एडवर्ड चतुर्थ भी यह विचित्र मशीन  को देखने आया | शाही जलूस जब छापेखाने पहुचा तो विलियम और उसके साथी अपने काम  में लगे हुए थे | दुकान में हर और धातु के छोटे - छोटे अक्षरों के ढेर पड़े थे | सम्राट और उसके धनी मंत्रियों ने कागज छपते देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ | विलियम ने अपने छापेखाने में बहुत सी सस्ती पुस्तके छापी | प्राचीन काल में तो पुस्तके महँगी थी और केवल धनी आदमी ही उन्हें खरीद सकते थे | अब पुस्तके सामान्य लोगो के हाथो में भी पहुच गयी | लोग बड़े शौक से पुस्तके पढने और सुनने लगे | विलियम ने कहानियो की बहुत सी पुस्तके वीरो के कारनामे , गिरजे की प्रार्थनाये , प्रवचन छापे | विलियम कहते थे कि विद्या बड़े आदमियों के घर की दासी नही है कि हर समय उन्ही की सेवा करती रहे | विद्या प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है | विद्या पुस्तको से प्राप्त होती है | इसीलिए पुस्तके अधिक से अधिक और सस्ती छपनी चाहिए |
विलियन अब इस दुनिया में नही है लेकिन उनका कारनामा अब भी जिन्दा है | विलियम के बाद छापेखाने की बड़ी उन्नति हुई | संसार में प्रत्येक नगर में कई - कई छापेखाने खुले | हजारो - लाखो पुस्तके , पत्रिकाए और अख़बार छपने लगे | अज छापेखाने में ऐसी मशीने लगी हुई है जो रातो -- रात हजारो अखबार छापकर तैयार कर देती है | आधुनिक तकनीक के प्रेस समेत पुस्तकीय ज्ञान से आलोकित समस्त विश्व विलियम कैक्सटन का ऋणी है और रहेगा |  
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-सुनील दत्ता
  स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
आभार सुरजीत की पुस्तक '' प्रसिद्द वैज्ञानिक और उनके आविष्कार '' से

जिनके हम ऋणी हैं...अलेक्जेंडर ग्राहम बेल

आज की दुनिया बड़ी तेजी से चल रही है और बदल भी रही है --- आज हम जिस ग्लोबल दुनिया में जी रहे है उसमे एक ऐसे यंत्र का योगदान है जिसके बिना अब हम जी भी नही सकते है वो है टेलीफोन -- आज हम ले चलते है टेलीफोन के उस अविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल के पास अगर उन्होंने इस यंत्र को ईजाद न किया होता तो शायद हम इस ग्लोबल दुनिया में नही जीते -----

तीसरे पहर का समय था बोर्डिंग -- हाउस के एक पुराने कमरे में बिजली के तार बिखरे हुए थे | तारो के जाल में उलझा हुआ एक आदमी उपर के मंजिल में और दूसरे निचली मंजिल के एक कमरे में बैठा था | उपर कमरे में बैठा हुआ आदमी एक भद्दा सा यंत्र मुख से लगाये बार - बार एक वाक्य बोल रहा था और नीचे बैठा हुआ आदमी उस वाक्य को सुनने का प्रयतन कर रहा था | अकस्मात नीचे बैठा हुआ आदमी अपना यंत्र फेंककर उठा और तेजी से उपरी मंजिल की और भभागा | उपर पहुचते ही वह ख़ुशी से चिल्लाया -- मैंने बात सुन ली | ईश्वर की सौगंध साफ़ सुनाई देती है | आपने कहा था --- '' यहाँ आइये मुझे आपकी जरूरत है '' | तारो में उलझा हुआ आदमी हँसने लगा -- '' ईश्वर का धन्यवाद है मुझे अपनी कई वर्ष की मेहनत का फल मिल गया '' |

यह महान वैज्ञानिक कोई और नही अलेक्जेंडर ग्ग्राहम बेल थे | उन्होंने अपने साथी वाटसन से ( जो निचले कमरे में थे ) बाते की थी और जिस यंत्र पर ग्राहम बेल ने बात की थी , उसे आज हम टेलीफोन कहते है |

ग्राहम बेल स्काटलैंड के एक नगर एडनबरा में जन्मे थे | उनके पिता प्रसिद्द आदमी थे | बेल के पिता ने गुंगो और बहरो को पढाने के लिए नये ढंग का आविष्कार किया था | ग्राहम बेल शुरू में अपने नगर में पढ़ते रहे | फिर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लन्दन भेजा गया | बाद में उन्होंने जर्मनी से पी . एच . डी की डिग्री प्राप्त की | शिक्षा के बाद घर वापस आये तो उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चूका था | डाक्टरों ने कहा कि बेल को क्षयरोग होने की आशका है | उनके पिता को बहुत चिंता हुई | वह तत्काल बेटे को अपने साथ लेकर कनाडा चले गये | कनाडा में बेल का स्वास्थ्य सुधर गया |
ग्राहम बेल को बचपन से ही नई चीजे मालूम करने का शौक था | जब वह स्कूल में पढ़ते थे . तो एक दिन मित्रो के साथ एक पहाड़ी पर गये | वहा आटा पिसने का एक कारखाना था और बहुत सी गेहू की बालिया पड़ी थी | कारखाने के स्वामी ने सब लडको को एक -- एक बाली दी | बाकी लडको ने तो बालिया फेंक दी . लेकिन बेल बाली घर ले आये | उन्हें एक नई बात सूझी | झट जेब से नाख़ून तराश निकला और उससे गेंहू के दानो को अलग -- अलग करने लगे | उन्होंने देखा कि इस ढंग से दाने बहुत जल्दी और सफाई से निकल आते है | बेल ने अपना यह प्रयोग कारखाने के स्वामी को लिख भेजा | स्वामी ने उनको धन्यवाद किया और बालियों से गेंहू निकालने के लिए नाख़ून तराश से मिलती -- जुलती कई मशीन बनवा ली |
जब बेल का स्वास्थ्य ठीक हो गया तो उन्होंने अमरीका के पुराने नगर बोस्टन में एक स्कुल खोल लिया | इस स्कुल में बेल उन अध्यापको को प्रशिक्ष्ण देते जो बहरो को पढाते थे | बेल को विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर बना दिया गया | उन्ही दिनों बेल की मुलाक़ात एक भरी लडकी से हुई | यह लड़की बेल के काम में बहुत मदद करती थी | बाद में दोनों ने विवाह कर लिया | बहरो को पढ़ाते -- पढ़ाते बेल ने सोचा कि किसी ऐसे यंत्र का आविष्कार करना चाहिए जिससे कई मील दूर बैठे हुए आदमी से बात की जा सके | उन्होंने सोचा कि बिजली की शक्ति के जरिये मनुष्य की आवाज एक जगह से दूसरी जगह पहुच सकती है |
मनुष्य के कान की बनावट का पता चला , तो बेल ने बोस्टन के एक बोर्डिंग -- हॉउस में दो कमरे किराए पर लिए और प्रयोगों में व्यस्त हो गये | कई दिन की लगातार मेहनत के बाद आखिर उन्होंने एक भद्दा यंत्र तैयार कर लिया | इस यंत्र से बेल ने अपने सहायक से यह बात कही , मिस्टर वाटसन , यहाँ आइये , मुझे आपकी जरूरत है |

ग्राहम बेल अपने आविष्कार पर बहुत परसन्न हुए | उन दिनों नगर में एक प्रदर्शनी लगी हुई थी | बेल ने लोगो को दिखाने के लिए अपना यंत्र प्रदर्शनी में रख दिया < लेकिन किसी ने उस यंत्र में रूचि नही ली | इस बात से बेल को बड़ा दुःख हुआ | सयोगवश ब्राजील के सम्राट को , जो प्रदर्शनी देख रहे थे , इस आविष्कार का पता चला | उन्होंने टेलीफोन का चोगा कान पर रखकर ग्राहम बेल से कहा -- '' आप मुझसे कोई बात करे "

बेल ने अपने यंत्र से शेक्सपियर के प्रसिद्द नाटक से एक वाक्य बोला | दूसरी और खड़े ब्राजील के सम्राट उछल पड़े '' बिलकुल साफ़ आवाज आती है '' सम्राट इस आविष्कार से खुश हुए , तो सब लोग रूचि लेने लगे और बेल प्रख्यात हो गये |
इधर बेल का आविष्कार सफल हुआ , उधर कई अन्य लोग भी टेलीफोन के अविष्कारक बन बैठे | बेल के लिए बड़ी कठिनाई पैदा हो गयी | कई दावेदारों ने बेल पर मुकदमे कर दिए | बेल एक अवधि तक अदालतों में फंसे रहे | आखिर वह मुकदमा जीत गये और सबने मान लिया कि असल आविष्कार ग्राहम बेल का है | अब बेल लोगो के लिए टेलीफोन तैयार करना चाहते थे लेकिन उनके पास रुपया नही था | उन्होंने कई लोगो से मदद मांगी | जब रुपयों का प्रबंध हो गया , तो टेलीफोन तैयार होने लगा | इससे बेल के पास धन का पर्याप्त संचय होने लगा |
ग्राहम बेल ने अपने नाम से एक कम्पनी तैयार की | उसमे तीन भागीदार थे | कम्पनी ने व्यसाय शुरू कर दिया , लेकिन बेल को व्यवसाय से कोई दिलचस्पी नही थी | उन्होंने सोचा कि अब दूसरी चीज का आविष्कार होना चाहिए | बेल ने फोटोफोंन और ग्रामाफोन का आविष्कार किया | उन्होंने एक ऐसी पतंग तैयार की , जिसमे बैठकर एक आदमी उड़ सकता था | यह पतंग कुछ ऊँची उड़कर नीचे गिर पड़ी | अब बेल भेड़ो पर प्रयोग करने लगे | उनका विचार था कि वह ऐसी भेड़ पैदा करने में सफल हो जाए , जो सदा जुडवा बच्चे दिया करेगी | बेल का यह प्रयोग सफल नही हुआ | बेल ने एक कुत्ते को मानवीय बोली सिखानी शुरू की थी | यह कुत्ता थोड़ा बहुत बोलने भी लगा | लोगो को पता चला , तो दूर -- दूर से उस कुत्ते को देखने के लिए आए |

ग्राहम बेल बहुत समय के बाद अपने नगर एडनबरा लौटे | अब वह प्रख्यात आदमी थे | बेल के नगर के लोगो ने उनका बड़ा सम्मान किया | आखिर 1922 में अगस्त की दो तारीख को ग्राहम बेल का देहान्त हो गया |

आज हम टेलीफोन के द्वारा घर बैठे दूर से दूर बैठे अपने परिचितों से बाते कर लेते है जब भी टेलीफोन की गनती बजती है ग्राहम बेल के याद ताजा हो जाती है | वर्तमान दौर की सुचना -- क्रान्ति और उसका लाभ उठा रहा मानव समाज इस सुचना -- क्रान्ति के प्रारम्भिक पर महान अविष्कारक ग्राहम बेल के ऋणी है और ता उम्र ऋणी रहेगे |

-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
आभार सुरजीत की पुस्तक '' प्रसिद्द वैज्ञानिक और उनके आविष्कार '' से

रहस्यदर्शी -- व्यक्तित्व ------अलबर्ट आइन्सटीन

रहस्यदर्शी -- व्यक्तित्व अलबर्ट आइन्सटीन -------------- ( 14 मार्च , 1879 -- अप्रैल 18 , 1955 ) मन स्मृति है , बुद्दिमत्ता नही | बुद्दिमत्ता तब होती है जब तुम नई बातो का , नई मुश्किलों का सामना करते हो और तुम्हारा अस्तित्व उन नई समस्याओं को प्रतिबिबिम्बित करता और उसके समाधान खोजता है | तुम्हे उनके बारे में कभी नही बताया गया , तुमने कभी उनका अध्ययन नही किया | तुम्हारी स्मृति कोई उत्तर देने में पूरी तरह से अक्षम होती है | बड़े -- बड़े बुद्दिजीवी लोग नई समस्याओं का सामना करने में सदा कठिनाई में पड़ जाते है | ऐसा कहा जाता है कि एक दिन अलबर्ट आइन्सटीन , संसार के महानतम गणितज्ञो में से एक , विश्विद्यालय जाने के लिए बस में सधा और कंडक्टर को पैसे दिए | कंडेक्टर ने उसे टिकट और बचे हुए कुछ पैसे वापस किये | उसने पैसे गिने और कहा : ' क्यों भाई , तुम मुझे धोखा दे रहे हो ? " कंडक्टर ने कहा : ' शायद , कोई भूल हो गयी ... मुझे दुबारा गिनने दीजिये | ' उसने पैसे गिने और अलबर्ट आइन्सटीन ने कहा : महानुभाव , ऐसा लगता है आपको गिनती - विनती नही आती , आप जानते ही नही कि गुना -- भाग कैसे किया जाता है | कृपया चुप रहे और बैठ जाए | ' आइन्सटीन ने घर आकर अपनी पत्नी से कहा : ' मैं एकदम घबडा गया ; सारी बस हंस रही थी | वह तो अच्छा हुआ कि बस में कोई और प्रोफ़ेसर या विद्यार्थी न था ; किसी को पता न था कि मैं अलबर्ट आइन्सटीन हूँ | और कंडक्टर कह रहा था , ' आपको गिनती नही आती | ' और मैं मानवता के इतिहास में सर्वाधिक बड़ी संख्याओं के साथ कम किया है , मेरा सारा काम ही संख्याओं का है | मगर मैंने सोचा कि इस बारे में शोर न मचाना ही बेहतर है | तुम जरा ये पैसे गिनो और बताओ कि वह मुझे धोखा दे रहा था या कि मैं ही गलत था ? पत्नी ने पैसे गिने और बोली : ' ये बिलकुल ठीक है | तुम्हारी टिकट , जो पैसे तुमने उसे दिए , और जो उसने लौटाए उन्हें देख कर तो यही लगता है कि पूरा हिसाब एकदम सही है | और लगता यही है कि तुम गणित नही जानते ! तुम बड़ी संख्याओं के इतने आदि हो गये हो ... संख्याय जिसने आगे सैकड़ो शून्य लगे रहते है .. छोटी -- मोती संख्याओं को तो तुम भूल ही गये हो | तुम आगे कभी किसी से कुछ न कहना ; यदि कभी ऐसी स्थिति आ भी जाए , तो चुप ही रहना | ' मेरे एक मित्र , डाक्टर राम मनोहर लोहिया से मिलने गये थे -- डाक्टर लोहिया की शिक्षा जर्मनी में हुई थी | और वे नियत समय पर मिलने के लिए पहुचे गये | अलबर्ट आइन्सटीन की पत्नी ने खा ; ' आपको कुछ देर प्रतीक्षा करनी होगी | मैं सुनिश्चित रूप से नही बता सकती कि आपको कितनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी , क्योकि वे स्नान गृह में है और जब वे स्नान गृह में होते है तब उन्हें कोई बाधा पहुचाये , यह उन्हें बिलकुल पसंद नही है | और किसी को पता नही कि वे कितनी देर बाथरूम में रहेगे | ' डाक्टर लोहिया ने कहा : ' ठीक है , मैं प्रतीक्षा कर्ता हूँ | ' उन्होंने सोचा कि पन्द्रह मिनट , आधा घंटा -- कोई स्नान - गृह में इससे अधिक और क्या ठहरेगा ? मगर छह घन्टे बीत गये .. पत्नी ने उन्हें नाश्ता कराया , दोपहर का भोजन कराया और लोहिया ने कहा : ' हे भगवान , वे अभी भी तब में बैठे हुए है ? आखिर वे कर क्या रहे है ? पत्नी ने कहा : ' शुरू -- शुरू में जब हमारी शादी हुई थी मैं उन्हें बाधा पहुचा देती थी तो वे सारा दिन गुस्से में रहते थे | वे चीजे फेकते , सब तरह के उपद्रव करते , चीखते , चिल्लाते | वे बहुत परेशान हो जाते थे , क्योकि गणित की साड़ी खोज उन्होंने अपने तब में बैठकर साबुन के बुलबुलों के साथ ही की है | वे बुलबुलों से साबुन के बुलबुलों से खेलते रहते है ..... उनके लिए ये बुल;बुले ही तारे है | और वे गणित बिठाते रहते है . मैं नही जांति कि कैसे , परन्तु वे हिसाब -- किताब लगाते रहते है -- उन्होंने स्नान गृह की सब दिवालो पर लिखा हुआ है | मैं आपको उनका स्नान गृह दिखाउगी , वह सब गणित ही गणित है | ' छ घन्टे बाद अलबर्ट आइन्सटीन बाहर निकला और बोला : ' अच्छा तो आप आ गये ? आप बिलकुल ठीक समय पर आये है | जैसे ही मैं स्नान -- गृह से बाहर निकला आप यहाँ बैठे हुए है | ' डाक्टर लोहिया ने कहा : मैं यहाँ छ घन्टे से बैठा हुआ हूँ | ' वह बोला : हे भगवान ! छ घन्टे हो गये .. मुझे क्षमा कर दो क्योकि जब मैं अपने तब में साबुन के बुलबुलों के साथ होता हूँ , मैं समय को भूल ही जाता हूँ | तब बस गढ़ -- नक्षत्रो और सितारों के बारे में नये समीकरण , उनकी दुरिया -- तुम मेरा स्नान गृह देखो | ' डाक्टर लोहिया ने मुझे बताया कि ' वे दोनों स्नान गृह में ले गये | सब दीवालो पर बड़ी -- बड़ी समीकरण लिखी हुई थी ' उनकी समझ से बाहर था वे तो गणितज्ञ नही थे | डाक्टर लोहिया ने कहा " ' आपने तो अपने स्नान गृह को प्रयोगशाला बना रखा है | ' आइन्सटीन ने कहा : ' मैंने नही बनाई यह अपने आप ही प्रयोगशाला बन गयी है | ये साबुन के बुलबुले किसी न किसी रूप में सितारों से मिलते -- जुलते है " अब यह आदमी श्रेष्ठ्तम गणितज्ञ और बुद्दी के चरम शिखर पर पहुचे हुए व्यक्तियों में से एक था | परन्तु वह एक अत्यन्य कुरूप और अमानवीय घटना का कारण बना जो कि गैर -- बुद्दिमत्तापूर्ण थी | वही हिरोशिमा और नागासाकी में हुते भीषण नरसंहार का कारण था , क्योकि उसने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा : मैं परमाणु बम बना सकता हूँ | और आपने पास परमाणु बम का होना ही पर्याप्त होगा , उन्हें छोड़ने की कोई आवश्यकता नही पड़ेगी | क्योकि जर्मनी और जापान से आत्मसमर्पण कराने के लिए परमाणु बम का पास होना ही काफी है | ' मगर यह एक बहुत ही नासमझी भरा , नादानी पूर्ण कार्य था जो उसने किया | रूजवेल्ट ने उसे अनुमति दे दी , साथ ही परमाणु बम बनानेके लिए साड़ी सुविधाए भी प्रदान की | उसने परमाणु बम बनाये और एक बार जब परमाणु बम बन गये , वे राजनितिज्ञो के हाथ में पहुच गये | आइन्स्टीन ने उन्हें लिखा -- रूजवेल्ट अब राष्ट्रपति न था , ट्रूमैन राष्ट्रपति बन गया था , उसने ट्रूमैन को लिखा कि --- ' उन बमो का प्रयोग नही किया जाना चाहिए | पत्र में यही मेरी पहली शर्त थी | ' लेकिन ट्रूमैन ने पत्र का उत्तर तक नही दिया | कौन प्रवाह करता है ? तुमने अपना कम कर दिया , तुम्हे अपने काम की कीमत मिल गयी | अब तुम बमो के स्वामी नही हो , बम तो सरकार के है | और ट्रूमैन ने उन बमो को हिरोशिमा और नागासाकी पर बिना किसी कारण के गिराया | जर्मनी तो पहले ही पराजित हो चूका था , उसने अपनी पराजय स्वीकार भी कर ली थी | और जापान किसी भी दिन आत्समर्पण के लिए तैयार था .. विशेषज्ञ कहते है कि अधिक से अधिक एक या दो सप्ताह के भीतर जापान समर्पण करने ही वाला था | जर्मनी के बिना जापान युद्द में अकेला टिक नही सकता था और उन लोगो को जिनका युद्द से कुछ लेना देना न था छोटे बच्चे स्त्रिया वृद्द मान बाप गर्भवती औरते जिन्हें युद्द से कोई मतलब न था उन्हें नष्ट कर देने की कोई आवश्यकता न थी | और यह कोई छोटी संख्या नही थी -- हर नगर में एक लाख से अधिक व्यक्ति रहते थे | दो लाख व्य्कतियो को .... लेकिन ट्रूमैन इन बमो का जितनी जल्दी से जल्दी संभव हो सके उपयोग करने में उत्सुक था क्योकि जापान ने समर्पण कर दिया , तो फिर कोई अवसर नही छोड़े जा सकते थे | फिर कोई अवसर नही बचेगा , बहाना नही मिलेगा | और वह प्रयोग करना चाहता था | वह अणु -- बमो की शक्ति -- परिक्षण का एक प्रयोग था | दो लाख व्यक्ति क्षण भर में जलकर ख़ाक हो गये | और कई -- कई पीढियों तक उन दो बमो का असर जारी रहेगा , न केवल मनुष्यों में ; मछलियों में पशुओ में वृक्षी में सब जगह रेडियेशन व्याप्त रहेगा | उस समय अलबर्ट आइन्सटीन रो रहा था और कह रहा था , ' मैं एक बुद्दिहींन आदमी हूँ | मैं एक सरल सी बात नही देख पाया ; कि एक बार तुम राजनितिज्ञो के हाथ में शक्ति सौप दो , फिर यह तुम्हारे हाथ से बाहर की बात हो जाती है , फिर तुम कुछ नही कर सकते | ' मृत्यु के समय उसके अंतिम शब्द थे ; ' अपने अगले जन्म में मैं एक नल ठीक करने वाले कारीगर की भाँती पैदा होना पसंद करूंगा न कि एक भौतिक -- विद की भांति , क्योकि मैं ऐसे हत्यारे कृत्य पुन: नही करना चाहूंगा | और यह मेरी मूढ़ता था ... हालाकि जो प्रस्ताव उसने रखा था वह बौद्दिक जरुर था , पर विवेकपूर्ण जरा भी न था : शक्ति का प्रदर्शन ही पर्याप्त है ' | लेकिन राजनितिज्ञ अपनी शक्ति दिखाने के लिए इतने आतुर , इतने भूखे है कि जब तक कि सारी दुनिया उसे महसूस न कर ले . वे स्वंय को रोक पाने में असमर्थ होते है | प्रस्तुती --- सुनील दत्ता साभार अनंत से अनंत की ओर ------ ओशो -------( स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक )